कागज़ हमारे दैनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। किताबें, कॉपियाँ, अखबार, पैकेजिंग और कई अन्य चीजों में कागज़ का उपयोग किया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कागज़ बनता कैसे है? कागज़ बनाने के लिए मुख्य रूप से पौधों और पेड़ों में पाए जाने वाले सेल्यूलोज़ (Cellulose) नामक प्राकृतिक रेशे का उपयोग किया जाता है।
आजकल कागज़ केवल पेड़ों की लकड़ी से ही नहीं, बल्कि बाँस, गन्ने की खोई, गेहूँ के भूसे और अन्य पौधों के रेशों से भी बनाया जा सकता है।
1. कच्चे माल का चयन
कागज़ बनाने के लिए सबसे पहले ऐसे पौधों या पेड़ों की सामग्री एकत्र की जाती है जिनमें पर्याप्त मात्रा में सेल्यूलोज़ मौजूद हो। परंपरागत रूप से लकड़ी का उपयोग अधिक किया जाता है। इसके अलावा बाँस और कृषि से निकलने वाले रेशेदार अवशेष भी उपयोगी कच्चा माल हैं।
पर्यावरण को नुकसान कम करने के लिए सूखी या कृषि-अवशेष सामग्री तथा पुनर्चक्रित कागज़ का उपयोग करना बेहतर विकल्प माना जाता है।
2. लकड़ी को छोटे टुकड़ों में बदलना
यदि लकड़ी का उपयोग किया जा रहा है, तो सबसे पहले उसकी छाल हटाई जाती है। इसके बाद लकड़ी को मशीनों की सहायता से छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है। इन छोटे टुकड़ों को सामान्यतः वुड चिप्स कहा जाता है।
छोटे टुकड़े होने से लकड़ी के रेशों को आगे की प्रक्रिया में अलग करना आसान हो जाता है।
3. पल्प तैयार करना
अब लकड़ी या पौधों के रेशों से पल्प (Pulp) तैयार किया जाता है। पल्प एक गाढ़ा, रेशेदार मिश्रण होता है जिसमें सेल्यूलोज़ के रेशे मौजूद रहते हैं।
औद्योगिक स्तर पर पल्प बनाने के लिए यांत्रिक और रासायनिक दोनों तरह की प्रक्रियाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य रेशों को अलग करना और उन्हें कागज़ बनाने योग्य बनाना होता है।
4. पल्प की सफाई
पल्प तैयार होने के बाद उसमें मौजूद लकड़ी के छोटे टुकड़े, गंदगी और अन्य अवांछित पदार्थों को अलग किया जाता है। आवश्यकता के अनुसार पल्प को साफ और अधिक समान बनाया जाता है।
कागज़ का रंग सफेद करने के लिए उद्योगों में अलग-अलग प्रक्रियाओं का इस्तेमाल किया जाता है। पर्यावरण-अनुकूल कागज़ बनाने में कम हानिकारक प्रक्रियाओं को प्राथमिकता दी जाती है।
5. पल्प को पानी में मिलाना
साफ किए गए पल्प को बड़ी मात्रा में पानी के साथ मिलाया जाता है। इससे पल्प एक पतले घोल या मिश्रण के रूप में फैल जाता है।
इसके बाद इस मिश्रण को एक चलती हुई महीन जालीदार स्क्रीन पर फैलाया जाता है। जाली पर से पानी नीचे निकलने लगता है और सेल्यूलोज़ के रेशे आपस में जुड़कर एक पतली परत बनाने लगते हैं।
6. पानी निकालकर शीट बनाना
जाली पर बनी रेशेदार परत से अतिरिक्त पानी निकालने के लिए प्रेस और रोलर का उपयोग किया जाता है। दबाव पड़ने से रेशे आपस में अच्छी तरह जुड़ जाते हैं और कागज़ की गीली शीट का आकार लेने लगते हैं।
इस चरण में कागज़ की मोटाई और मजबूती को भी नियंत्रित किया जा सकता है।
7. कागज़ को सुखाना
अब गीली कागज़ की शीट में अभी भी काफी मात्रा में पानी मौजूद होता है। इसलिए इसे गर्म रोलरों या नियंत्रित तापमान वाली सुखाने की प्रक्रिया से गुजारा जाता है।
धीरे-धीरे पानी निकलने के बाद शीट सूखकर कागज़ में बदल जाती है।
8. कागज़ की फिनिशिंग
सूखने के बाद कागज़ को चिकना और समान बनाने के लिए विशेष रोलरों से गुजारा जाता है। आवश्यकता के अनुसार कागज़ की सतह पर कोटिंग भी की जा सकती है।
इसके बाद कागज़ को उपयोग के अनुसार अलग-अलग आकार की शीट या बड़े रोल में काटा जाता है।
पौधों से कागज़ बनाने के फायदे
पौधों से प्राप्त रेशों का उपयोग करके कागज़ बनाने के कई फायदे हो सकते हैं। बाँस, गन्ने की खोई और कृषि-अवशेष जैसे विकल्प लकड़ी पर निर्भरता को कम करने में मदद कर सकते हैं।
इसके अलावा पुराने कागज़ को रिसाइकल करके दोबारा कागज़ बनाना भी प्राकृतिक संसाधनों की बचत का एक महत्वपूर्ण तरीका है।
निष्कर्ष
कागज़ बनाने की प्रक्रिया में पौधों के रेशों को पहले पल्प में बदला जाता है। इसके बाद पल्प को साफ करके पानी में फैलाया जाता है, उसकी पतली परत बनाई जाती है, पानी निकाला जाता है और अंत में उसे सुखाकर तथा फिनिशिंग करके कागज़ तैयार किया जाता है।
इसलिए कागज़ का उपयोग करते समय हमें अनावश्यक बर्बादी से बचना चाहिए और जहाँ संभव हो वहाँ रीसाइकल किए गए कागज़ का इस्तेमाल करना चाहिए। इससे पेड़ों और प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ने वाला दबाव कम करने में मदद मिलती है।
