🌱 बचपन और परिवार
भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के बंगा गाँव, लायलपुर ज़िले में हुआ था, जो आज पाकिस्तान में है। उनका परिवार देशभक्ति और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा हुआ था। उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह अंग्रेज़ी शासन के विरोधी थे।
इसलिए भगत सिंह ने बचपन से ही अपने आसपास आज़ादी और देशभक्ति की बातें सुनीं।
कहा जाता है कि जब वे बहुत छोटे थे, तभी से उनके मन में अंग्रेज़ों को भारत से बाहर निकालने का विचार पैदा होने लगा था।
🔥 जलियांवाला बाग का प्रभाव
13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में अंग्रेज़ अधिकारी जनरल डायर के आदेश पर निहत्थी भीड़ पर गोलियाँ चलवाई गईं। सैकड़ों लोग मारे गए।
इस घटना ने पूरे भारत को झकझोर दिया।
भगत सिंह पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ा। वे बाद में जलियांवाला बाग गए और वहाँ की मिट्टी अपने साथ लेकर आए—हालाँकि इस घटना से जुड़ी कुछ लोकप्रिय बातें इतिहासकारों के बीच अलग-अलग रूप में मिलती हैं।
उनके मन में यह भावना और मजबूत हो गई कि भारत को स्वतंत्र होना चाहिए।
📚 पढ़ाई और विचार
भगत सिंह सिर्फ हथियार उठाने वाले क्रांतिकारी नहीं थे। वे बहुत पढ़ने वाले और गंभीर विचारक भी थे।
उन्होंने इतिहास, राजनीति, समाजवाद, अर्थव्यवस्था और क्रांति से जुड़ी किताबें पढ़ीं। वे मानते थे कि केवल अंग्रेज़ों को हटाना ही पर्याप्त नहीं है; भारत में एक ऐसा समाज भी बनना चाहिए जिसमें गरीबी, शोषण और भेदभाव कम हों।
उन्होंने युवाओं को जागरूक करने के लिए नौजवान भारत सभा जैसे संगठनों के माध्यम से काम किया।
⚔️ लाला लाजपत राय की मृत्यु
1928 में अंग्रेज़ सरकार ने साइमन कमीशन भारत भेजा। भारतीयों में इसका विरोध हुआ क्योंकि इसमें कोई भारतीय सदस्य नहीं था।
लाहौर में इसके विरोध में प्रदर्शन हुआ, जिसका नेतृत्व लाला लाजपत राय कर रहे थे।
प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज किया और लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए। कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो गई।
भगत सिंह और उनके साथियों ने इसे बहुत गंभीर घटना माना। उन्होंने पुलिस अधिकारी जेम्स ए. स्कॉट को निशाना बनाने की योजना बनाई, लेकिन गलती से पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या हो गई।
इसके बाद भगत सिंह को पकड़ने के लिए अंग्रेज़ सरकार ने अभियान शुरू कर दिया।
💣 विधानसभा बम कांड
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय विधान सभा में बम फेंका।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है: उनका उद्देश्य लोगों की हत्या करना नहीं था। उन्होंने ऐसा बम इस्तेमाल किया जिससे व्यापक जान-माल की क्षति न हो और फिर जानबूझकर गिरफ्तारी दी।
वे अदालत का इस्तेमाल अपने विचार लोगों तक पहुँचाने के लिए करना चाहते थे।
उनका संदेश था कि अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता।
⛓️ जेल और भूख हड़ताल
गिरफ्तारी के बाद भगत सिंह को जेल में रखा गया।
उन्होंने भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ होने वाले भेदभाव का विरोध किया। भारतीय कैदियों को खराब भोजन और सुविधाएँ मिलती थीं, जबकि यूरोपीय कैदियों के साथ बेहतर व्यवहार किया जाता था।
इसके विरोध में भगत सिंह और अन्य कैदियों ने भूख हड़ताल की।
इस दौरान उनके साथी जतिन दास की लंबी भूख हड़ताल के बाद मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु ने पूरे देश में भारी प्रतिक्रिया पैदा की।
📖 जेल में भी पढ़ते रहे
जेल में रहते हुए भी भगत सिंह लगातार पढ़ते और लिखते रहे।
उन्होंने धर्म, नास्तिकता, क्रांति, समाज और राजनीति जैसे विषयों पर विचार लिखे। उनका प्रसिद्ध लेख “मैं नास्तिक क्यों हूँ” उनके वैचारिक चिंतन को समझने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
इससे पता चलता है कि भगत सिंह केवल भावनाओं से प्रेरित युवा नहीं थे—वे अपने विचारों को तर्क और अध्ययन के आधार पर विकसित करने की कोशिश करते थे।
⚖️ मुकदमा और फाँसी
जॉन सॉन्डर्स की हत्या के मामले में भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर को मौत की सजा सुनाई गई।
काफी लोगों ने उनकी सजा कम करने की मांग की। लेकिन उनकी सजा नहीं बदली गई।
23 मार्च 1931 को लाहौर जेल में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दे दी गई।
उस समय भगत सिंह की उम्र केवल 23 वर्ष थी।
🇮🇳 भगत सिंह की विरासत
भगत सिंह की मृत्यु के बाद वे भारतीय युवाओं के लिए साहस, त्याग और क्रांतिकारी विचारों का प्रतीक बन गए।
उनकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे सिर्फ अंग्रेज़ी शासन का विरोध नहीं करते थे, बल्कि एक बेहतर और अधिक न्यायपूर्ण समाज की कल्पना भी करते थे।
उनकी कहानी हमें यह सीख देती है:
“देश के लिए प्रेम केवल भावनाओं में नहीं, बल्कि अपने विचारों, साहस और जिम्मेदारी में भी दिखाई देता है।” 🇮🇳
23 मार्च को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत की याद में शहीद दिवस मनाया जाता है।
