बरसों पहले की बात है। उत्तर भारत के एक सुदूर इलाके में बसा था चंद्रपुर नाम का एक छोटा-सा गाँव। बाहर से देखने पर यह गाँव बिल्कुल साधारण लगता—कच्चे घर, संकरी गलियाँ, खेतों के बीच बहती एक छोटी नदी और गाँव के बीचों-बीच खड़ा एक विशाल पीपल का पेड़।
लेकिन इस पीपल के पेड़ के बारे में पूरे इलाके में एक अजीब सी बात मशहूर थी—
सूरज ढलने के बाद कोई उसके पास नहीं जाता था।
गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे कि यह पेड़ जितना पुराना है, उतना ही रहस्यमयी भी। रात के समय उसके नीचे से अजीब-अजीब आवाज़ें आती थीं। कई लोगों ने दावा किया था कि उन्होंने वहाँ किसी परछाईं को घूमते हुए देखा है।
शहर से आया लड़का
राहुल, जो शहर में पला-बढ़ा था, छुट्टियों में अपने मामा के घर चंद्रपुर आया था। वह पढ़ा-लिखा, आधुनिक सोच वाला लड़का था और इन भूत-प्रेत की बातों पर बिल्कुल भरोसा नहीं करता था।
पहली ही शाम, जब उसने गाँव के लड़कों से पीपल के पेड़ की कहानी सुनी, तो हँस पड़ा।
“अरे यार, ये सब अंधविश्वास है। पेड़ है, पेड़ ही रहेगा,” उसने कहा।
गाँव के एक लड़के मोहन ने गंभीर आवाज़ में कहा,
“भैया, मज़ाक मत करो। उस पेड़ के नीचे जो गया है… वो बदला हुआ लौटा है।”
राहुल को यह बात और भी दिलचस्प लगी।
पहली अजीब घटना
उसी रात राहुल को नींद नहीं आ रही थी। बाहर से हवा में पत्तों की सरसराहट और दूर कहीं कुत्तों के रोने की आवाज़ आ रही थी।
अचानक उसने खिड़की से देखा—
पीपल के पेड़ के नीचे एक हल्की रोशनी जल रही थी।
घड़ी देखी—रात के ठीक बारह बजे थे।
राहुल का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा, लेकिन डर से ज़्यादा उसे उत्सुकता हो रही थी। उसने सोचा, “ज़रूर कोई लालटेन या मोबाइल की रोशनी होगी।”
लेकिन गाँव में उस वक्त कोई बाहर नहीं निकलता था।
चेतावनी
अगली सुबह राहुल ने अपनी मामी से पूछा,
“मामी, उस पीपल के पेड़ की कहानी क्या है?”
मामी का चेहरा पीला पड़ गया।
“बेटा, उस पेड़ के बारे में सवाल मत किया करो। तुम्हारे मामा ने मना किया है।”
मामा ने गंभीर स्वर में कहा,
“राहुल, हम तुम्हें रोक नहीं सकते सोचने से, लेकिन उस पेड़ के पास मत जाना। यह सिर्फ़ कहानी नहीं है।”
जब बड़े लोग किसी बात को टालते हैं, तो रहस्य और गहरा हो जाता है।
पुराने काग़ज़
राहुल को गाँव के पुराने स्कूल के खंडहर में कुछ पुराने काग़ज़ मिले। वह इतिहास में दिलचस्पी रखता था।
उन काग़ज़ों में लिखा था कि लगभग 80 साल पहले, उसी पीपल के पेड़ के नीचे गाँव की पंचायत बैठा करती थी।
उसी समय एक व्यक्ति था—देवदत्त।
गाँव का सबसे पढ़ा-लिखा इंसान।
लेकिन एक दिन उस पर आरोप लगा कि उसने गाँव के खज़ाने से चोरी की है। बिना पूरी जाँच के पंचायत ने उसे दोषी ठहरा दिया।
सज़ा—
उसे उसी पीपल के पेड़ के नीचे बाँधकर अपमानित किया गया।
कुछ दिनों बाद देवदत्त अचानक गायब हो गया।
रहस्य गहराता है
राहुल को समझ आने लगा कि पेड़ का रहस्य किसी आत्मा से नहीं, बल्कि किसी अन्याय से जुड़ा हो सकता है।
उसी रात उसने ठान लिया—
“आज मैं पीपल के पेड़ के पास जाऊँगा।”
आधी रात को, जब पूरा गाँव सो रहा था, राहुल चुपचाप घर से निकल पड़ा। चाँदनी में पीपल का पेड़ और भी डरावना लग रहा था।
जैसे-जैसे वह पास गया, हवा ठंडी होती चली गई।
वह आवाज़
अचानक किसी ने धीमी आवाज़ में कहा—
“तुम क्यों आए हो?”
राहुल के कदम रुक गए।
“क… कौन है?” उसने काँपती आवाज़ में पूछा।
पीपल के तने के पास एक धुँधली आकृति दिखाई दी।
आवाज़ आई—
“मैं वही हूँ, जिसे बिना सुने सज़ा दी गई थी।”
राहुल समझ गया—यह देवदत्त की आत्मा थी या उसकी स्मृति।
सच की कहानी
उस आकृति ने बताया कि असल में चोरी किसी और ने की थी। देवदत्त ने सच बताने की कोशिश की, लेकिन किसी ने उसकी नहीं सुनी।
उसकी मौत नहीं हुई थी—
वह गाँव छोड़कर चला गया था, लेकिन उसका दर्द और अपमान वहीं रह गया।
वही दर्द हर रात लोगों को डराता था।
समाधान
राहुल ने तय किया कि वह गाँव वालों को सच्चाई बताएगा। उसने पुराने काग़ज़, सबूत और देवदत्त की कहानी सबके सामने रखी।
पहली बार पंचायत ने अपनी गलती मानी।
पीपल के पेड़ के नीचे एक छोटा-सा स्मृति-चिह्न बनाया गया—
जहाँ लिखा था:
“अन्याय का बोझ कभी मिटता नहीं।”
आख़िरी रात
उस रात राहुल फिर से पीपल के पेड़ के पास गया।
हवा शांत थी। कोई रोशनी नहीं, कोई आवाज़ नहीं।
बस एक पत्ता उसके पैरों के पास गिरा।
राहुल मुस्कुराया।
रहस्य खत्म हो चुका था।
लेकिन जाते-जाते उसे लगा जैसे किसी ने फुसफुसाकर कहा हो—
“सच देर से ही सही, पर आता ज़रूर है।”