सन्नाटे का कुआँ BY PRIYA GUPTA

 


1. गाँव जहाँ सूरज जल्दी ढल जाता था

उत्तर भारत के एक दूरदराज़ इलाके में बसा था धर्मपुर गाँव। बाहर से देखने पर यह गाँव बिल्कुल सामान्य लगता था—कच्चे घर, पीपल का पुराना पेड़, छोटा सा मंदिर और खेतों के बीच जाती पतली सड़क।
लेकिन एक बात थी जो इस गाँव को बाकी गाँवों से अलग बनाती थी।

यहाँ शाम होते ही सन्नाटा छा जाता था

सूरज ढलते ही लोग अपने-अपने घरों के दरवाज़े बंद कर लेते। न कोई बाहर निकलता, न कोई आवाज़ आती। ऐसा लगता मानो पूरा गाँव साँस रोक कर बैठ गया हो।

गाँव के बीचों-बीच एक पुराना कुआँ था—टूटी हुई मुंडेर, काई जमी दीवारें और भीतर झांकने पर दिखाई देने वाला घना अंधेरा।
लोग उसे कहते थे—
“सन्नाटे का कुआँ”

2. चेतावनी जो हर कोई जानता था

गाँव के बुज़ुर्ग बच्चों को हमेशा कहते—

“सूरज ढलने के बाद कुएँ के पास मत जाना…
वो आवाज़ें सुनाई देती हैं।”

कोई पूछता, “कौन सी आवाज़ें?”
तो जवाब मिलता, “जो तुम्हें बुलाए…”

लोगों का कहना था कि रात में कुएँ से किसी के रोने, किसी के हँसने और कभी-कभी किसी के नाम पुकारने की आवाज़ आती है।

लेकिन जिसने भी उन आवाज़ों का जवाब दिया…
वह फिर कभी पहले जैसा नहीं रहा

3. शहर से आया लड़का – आरव

इसी गाँव में एक दिन शहर से आया एक लड़का—आरव
वह अपने मामा के घर गर्मियों की छुट्टियाँ बिताने आया था।

आरव पढ़ा-लिखा था, आधुनिक सोच रखता था।
भूत-प्रेत, आत्मा, डर—इन सब पर उसे हँसी आती थी।

पहली ही शाम उसने देखा कि लोग जल्दी-जल्दी घरों में घुस रहे हैं।

आरव ने पूछा,
“इतनी जल्दी सब क्यों?”

मामा ने बस इतना कहा—
“अंधेरा होने से पहले घर आ जाना ही अच्छा है।”

आरव को यह बात अजीब लगी।

4. पहली आवाज़

उस रात आरव को नींद नहीं आ रही थी।
चारों तरफ़ सन्नाटा था—इतना गहरा कि अपने दिल की धड़कन सुनाई दे।

अचानक…

“आरव…”

किसी ने धीरे से उसका नाम पुकारा।

वह चौंक गया।
खिड़की के पास गया—कुछ नहीं।

फिर आवाज़ आई—
“आरव… यहाँ आओ…”

आवाज़ कुएँ की दिशा से आ रही थी।

उसका दिल तेज़ धड़कने लगा, लेकिन दिमाग कह रहा था—
ये बस वहम है।

5. सच और जिज्ञासा के बीच

अगले दिन आरव ने गाँव के बच्चों से कुएँ के बारे में पूछा।

एक लड़के ने फुसफुसाकर कहा—
“कहते हैं, बरसों पहले एक औरत ने अपने बच्चे के साथ इसी कुएँ में छलांग लगा दी थी।”

“क्यों?” आरव ने पूछा।

“किसी ने सुना नहीं… बस रात में वही आवाज़ें आती हैं।”

आरव हँस पड़ा—
“स्टोरी है बस।”

लेकिन रात को…
वही आवाज़ फिर आई।

इस बार और साफ़।

6. कुएँ के पास

तीसरी रात आरव खुद को रोक नहीं पाया।
वह चुपचाप घर से निकल पड़ा।

चाँद आधा छिपा हुआ था।
कुएँ के पास पहुँचते ही ठंडी हवा का झोंका आया।

कुआँ…
वैसा ही अंधेरा, गहरा और डरावना।

तभी—

“आरव… मुझे बाहर निकालो…”

उसकी रगों में ठंड दौड़ गई।

7. अंधेरे से आती सच्चाई

आरव ने काँपती आवाज़ में कहा,
“क… कौन हो तुम?”

कुएँ से जवाब आया—
“मैं भी यहीं रहती थी… तुम्हारी तरह…”

हवा तेज़ हो गई।
कुएँ से सिसकियों की आवाज़ आने लगी।

आरव को लगा जैसे कोई ऊपर चढ़ने की कोशिश कर रहा हो।

उसने पीछे मुड़कर भागना चाहा…
लेकिन उसके पैर जैसे ज़मीन से चिपक गए हों।

8. सन्नाटे का रहस्य

अचानक गाँव के बुज़ुर्ग वहाँ पहुँच गए।
उन्होंने मंत्र पढ़े, दीप जलाया और कुएँ की ओर देखा।

एक बुज़ुर्ग बोले—
“हमने कहा था… ये कुआँ भूली हुई आत्माओं का घर है।
जो उन्हें सुनता है, वो उन्हें अपनी ज़िंदगी दे बैठता है।”

कुएँ से एक आख़िरी चीख़ आई…
और सब शांत हो गया।

9. बदल चुका आरव

आरव को घर लाया गया।
वह ज़िंदा था… लेकिन बदला हुआ।

वह अब:

  • अकेला रहने लगा

  • अंधेरे से डरने लगा

  • और रात में किसी से बात नहीं करता

शहर लौटते समय उसने बस इतना कहा—

“कुछ सन्नाटे… आवाज़ से ज़्यादा डरावने होते हैं।”

10. आज भी…

आज भी धर्मपुर गाँव में शाम होते ही दरवाज़े बंद हो जाते हैं।
कुआँ अब भी वहीं है।

और कहते हैं—

अगर आप ध्यान से सुनें…
तो कभी-कभी
कोई आपका नाम लेता है।

लेकिन याद रखना—

अगर सन्नाटा आपको बुलाए…
तो जवाब मत देना।

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