मौर्य साम्राज्य का उत्कर्ष और पतन by priya gupta

 भारतीय इतिहास में मौर्य साम्राज्य का नाम अत्यंत गौरवपूर्ण स्थान रखता है। यह भारत का पहला ऐसा साम्राज्य था जिसने लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को एक राजनीतिक इकाई के रूप में संगठित किया। मौर्य साम्राज्य का उत्कर्ष केवल सैन्य विजय तक सीमित नहीं था, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था, आर्थिक समृद्धि, कला-संस्कृति और धर्म के क्षेत्र में भी इसकी उपलब्धियाँ उल्लेखनीय थीं। किंतु जिस प्रकार इसका उदय अत्यंत प्रभावशाली रहा, उसी प्रकार इसका पतन भी ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इस लेख में हम मौर्य साम्राज्य के उदय, उत्कर्ष और पतन का विस्तृत अध्ययन करेंगे। 

1. मौर्य साम्राज्य की पृष्ठभूमि

मौर्य साम्राज्य की स्थापना से पहले भारत अनेक छोटे-छोटे राज्यों और गणराज्यों में विभाजित था। मगध उस समय सबसे शक्तिशाली राज्य था। नंद वंश के शासनकाल में मगध अत्यंत समृद्ध था, परंतु जनता नंद शासकों से संतुष्ट नहीं थी। इसी समय एक प्रतिभाशाली ब्राह्मण, चाणक्य (कौटिल्य), ने एक युवा बालक चंद्रगुप्त मौर्य को तैयार किया, जो आगे चलकर मौर्य साम्राज्य का संस्थापक बना।

चाणक्य ने अपनी कूटनीति और राजनीतिक बुद्धिमत्ता के बल पर नंद वंश का अंत करवाया और 322 ईसा पूर्व में चंद्रगुप्त मौर्य को मगध के सिंहासन पर बैठाया। यही मौर्य साम्राज्य की शुरुआत थी।

2. चंद्रगुप्त मौर्य का उत्कर्ष

(क) साम्राज्य का विस्तार

चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने शासनकाल में उत्तरी भारत के अधिकांश भाग पर अधिकार कर लिया। सिकंदर की मृत्यु के बाद उसके सेनापति सेल्यूकस निकेटर ने भारत के पश्चिमोत्तर भाग पर अधिकार जमाने की कोशिश की, परंतु चंद्रगुप्त ने उसे पराजित किया। अंततः 305 ईसा पूर्व में दोनों के बीच संधि हुई, जिसके परिणामस्वरूप चंद्रगुप्त को अफगानिस्तान और बलूचिस्तान के कुछ भाग प्राप्त हुए।

(ख) प्रशासनिक व्यवस्था

चंद्रगुप्त ने एक सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की। चाणक्य द्वारा रचित ‘अर्थशास्त्र’ में शासन, अर्थव्यवस्था, न्याय, जासूसी और कूटनीति से संबंधित विस्तृत नियम दिए गए हैं। साम्राज्य को प्रांतों में विभाजित किया गया, जिनका संचालन राजकुमारों या विश्वसनीय अधिकारियों द्वारा किया जाता था।

(ग) आर्थिक स्थिति

मौर्यकालीन अर्थव्यवस्था कृषि, व्यापार और उद्योग पर आधारित थी। कर व्यवस्था सुव्यवस्थित थी। सड़कों और व्यापार मार्गों का विकास हुआ। विदेशी व्यापार भी फल-फूल रहा था।

3. बिंदुसार का शासन

चंद्रगुप्त के बाद उसका पुत्र बिंदुसार (298–273 ईसा पूर्व) गद्दी पर बैठा। उसने साम्राज्य की सीमाओं को दक्षिण भारत तक बढ़ाया। बिंदुसार के शासनकाल में साम्राज्य स्थिर और शक्तिशाली बना रहा। यद्यपि उसके शासनकाल के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है, फिर भी यह स्पष्ट है कि उसने अपने पिता की नीतियों को आगे बढ़ाया।

4. अशोक महान और साम्राज्य का स्वर्णकाल

मौर्य साम्राज्य का वास्तविक उत्कर्ष अशोक महान (273–232 ईसा पूर्व) के शासनकाल में हुआ। प्रारंभ में अशोक एक शक्तिशाली और कठोर शासक था। उसने कलिंग (वर्तमान उड़ीसा) पर आक्रमण किया। 261 ईसा पूर्व में हुए इस युद्ध में भारी जन-हानि हुई।

(क) कलिंग युद्ध और परिवर्तन

कलिंग युद्ध के बाद अशोक का हृदय परिवर्तन हुआ। उसने हिंसा त्यागकर बौद्ध धर्म अपनाया और ‘धम्म’ की नीति को अपनाया। उसने शांति, सहिष्णुता और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा दिया।

(ख) प्रशासन और लोककल्याण

अशोक ने जनकल्याणकारी नीतियाँ अपनाईं। सड़कों के किनारे वृक्ष लगवाए, कुएँ खुदवाए और धर्म महामात्रों की नियुक्ति की। उसने अपने संदेश शिलालेखों और स्तंभों पर खुदवाए, जो आज भी भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

(ग) धर्म प्रचार

अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए मिशनरियों को श्रीलंका, मध्य एशिया और अन्य देशों में भेजा। इस प्रकार मौर्य साम्राज्य का प्रभाव अंतरराष्ट्रीय स्तर तक फैला।

5. मौर्य साम्राज्य का पतन

अशोक की मृत्यु (232 ईसा पूर्व) के बाद मौर्य साम्राज्य का पतन प्रारंभ हो गया। इसके कई कारण थे:

(क) कमजोर उत्तराधिकारी

अशोक के बाद आने वाले शासक कमजोर और अयोग्य थे। वे विशाल साम्राज्य को नियंत्रित नहीं कर सके।

(ख) प्रशासनिक शिथिलता

केंद्र की शक्ति कमजोर होने लगी। प्रांतों में विद्रोह होने लगे। अधिकारियों में भ्रष्टाचार बढ़ गया।

(ग) आर्थिक संकट

जनकल्याणकारी योजनाओं और युद्धों के कारण खजाना खाली होने लगा। कर व्यवस्था कमजोर हो गई।

(घ) बाहरी आक्रमण

उत्तर-पश्चिम से यूनानी आक्रमणों का खतरा बढ़ गया। साम्राज्य की सीमाएँ सुरक्षित नहीं रहीं।

(ङ) धार्मिक नीति

कुछ इतिहासकारों का मत है कि अशोक की अहिंसा की नीति ने सेना को कमजोर बना दिया, जिससे साम्राज्य की सैन्य शक्ति घट गई।

6. मौर्य साम्राज्य का अंत

अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ था। 185 ईसा पूर्व में उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने उसकी हत्या कर दी और शुंग वंश की स्थापना की। इस प्रकार मौर्य साम्राज्य का अंत हुआ।

7. मौर्य साम्राज्य की विरासत

यद्यपि मौर्य साम्राज्य का पतन हो गया, परंतु उसकी विरासत आज भी जीवित है:

  • भारत का राजनीतिक एकीकरण

  • सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था

  • बौद्ध धर्म का वैश्विक प्रसार

  • अशोक स्तंभ और शिलालेख (जिनका प्रतीक आज भारत का राष्ट्रीय चिन्ह है)

  • कला और वास्तुकला का विकास

निष्कर्ष

मौर्य साम्राज्य का उत्कर्ष भारतीय इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। चंद्रगुप्त की वीरता, चाणक्य की नीति, बिंदुसार की स्थिरता और अशोक की मानवतावादी दृष्टि ने इसे महान बनाया। हालांकि कमजोर उत्तराधिकारियों, प्रशासनिक शिथिलता और बाहरी आक्रमणों के कारण इसका पतन हुआ, फिर भी मौर्य साम्राज्य ने भारतीय इतिहास को एक नई दिशा दी।

यह साम्राज्य हमें सिखाता है कि किसी भी राष्ट्र की शक्ति केवल सैन्य बल में नहीं, बल्कि सुदृढ़ प्रशासन, आर्थिक स्थिरता और नैतिक मूल्यों में निहित होती है। मौर्य साम्राज्य भारतीय इतिहास का एक उज्ज्वल उदाहरण है, जिसका प्रभाव आज भी हमारी संस्कृति और शासन व्यवस्था में दिखाई देता है।

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