भारतीय किसान के बारे में ऐतिहासिक विवरण ( By :- Raj gupta )

 भारतीय किसान भारत की सभ्यता और संस्कृति की आधारशिला रहा है। भारत को प्राचीन काल से ही कृषि प्रधान देश कहा जाता है। यहां की अधिकांश जनसंख्या आज भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। भारतीय किसान का इतिहास केवल खेती का इतिहास नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, परिश्रम, शोषण, सुधार और आत्मनिर्भरता की एक लंबी यात्रा है। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक किसान ने भारत की अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

1. प्राचीन भारत में किसान की स्थिति

भारत में कृषि का आरंभ अत्यंत प्राचीन है। सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग 2500 ईसा पूर्व) में संगठित कृषि व्यवस्था के प्रमाण मिलते हैं। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे नगरों में अनाज भंडार, कुएं और नालियां मिली हैं, जो दर्शाते हैं कि उस समय के किसान गेहूं, जौ और कपास जैसी फसलों की खेती करते थे। सिंचाई की समुचित व्यवस्था होने के कारण कृषि विकसित अवस्था में थी।

वैदिक काल में कृषि मुख्य व्यवसाय था। ऋग्वेद में हल, बैल और वर्षा का उल्लेख मिलता है। किसान वर्षा पर निर्भर रहते थे और प्रकृति की पूजा करते थे। उस समय भूमि को पवित्र माना जाता था और किसान समाज में सम्मानित स्थान रखता था।

मौर्य काल में कृषि को राज्य संरक्षण प्राप्त था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कृषि कर, सिंचाई और भूमि प्रबंधन का विस्तृत वर्णन मिलता है। किसानों से भूमि कर लिया जाता था, परंतु राज्य उनकी सुरक्षा और सिंचाई व्यवस्था का भी ध्यान रखता था। इस काल में कृषि उत्पादन बढ़ा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हुई।

2. गुप्त और प्रारंभिक मध्यकाल

गुप्त काल को भारत का स्वर्ण युग कहा जाता है। इस समय कृषि में स्थिरता और समृद्धि थी। भूमि अनुदान की प्रथा शुरू हुई, जिसमें ब्राह्मणों और मंदिरों को भूमि दी जाती थी। इससे किसानों पर कभी-कभी अतिरिक्त कर का बोझ भी बढ़ता था। फिर भी कृषि उत्पादन संतोषजनक था और किसान ग्रामीण जीवन का केंद्र थे।

प्रारंभिक मध्यकाल में सामंतवादी व्यवस्था विकसित हुई। राजा भूमि को सामंतों को देता था और सामंत किसानों से कर वसूलते थे। इस व्यवस्था में किसान सीधे राजा के बजाय सामंतों के अधीन हो गए। इससे उनकी स्वतंत्रता कुछ हद तक कम हुई।

3. दिल्ली सल्तनत और मुगल काल

दिल्ली सल्तनत के समय किसानों से भूमि कर लिया जाता था। कई बार कर की दरें अधिक होती थीं, जिससे किसानों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।

मुगल काल में कृषि व्यवस्था अधिक संगठित हुई। विशेषकर अकबर के शासनकाल में टोडरमल द्वारा भूमि मापन और कर निर्धारण की नई प्रणाली लागू की गई। इसे दहसाला प्रणाली कहा गया। इसमें औसत उपज के आधार पर कर तय किया जाता था। इससे किसानों को कुछ स्थिरता मिली।

मुगल काल में गेहूं, चावल, गन्ना, कपास और मसालों की खेती होती थी। सिंचाई के लिए नहरों और कुओं का उपयोग किया जाता था। हालांकि सूखा, बाढ़ और युद्ध जैसी परिस्थितियों में किसानों की स्थिति खराब हो जाती थी। फिर भी इस काल में कृषि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनी रही।

4. ब्रिटिश काल और किसान की दयनीय स्थिति

ब्रिटिश शासन भारतीय किसानों के लिए अत्यंत कठिन समय साबित हुआ। अंग्रेजों ने अपने आर्थिक लाभ के लिए भूमि व्यवस्था में बदलाव किए। स्थायी बंदोबस्त (1793) के तहत जमींदारों को भूमि का मालिक बना दिया गया और किसानों को उनके अधीन कर दिया गया। जमींदार अधिक कर वसूलते थे, जिससे किसान कर्ज में डूबने लगे।

रैयतवाड़ी और महालवाड़ी व्यवस्थाएं भी लागू की गईं, परंतु इनका उद्देश्य भी अधिक से अधिक राजस्व प्राप्त करना था। किसानों को नकदी फसलों जैसे नील और कपास की खेती के लिए मजबूर किया गया।

1859-60 में बंगाल में नील आंदोलन हुआ, जिसमें किसानों ने नील की जबरन खेती का विरोध किया। यह आंदोलन किसानों के संगठित प्रतिरोध का प्रारंभिक उदाहरण था।

1917 में चंपारण सत्याग्रह के माध्यम से महात्मा गांधी ने किसानों की समस्याओं को राष्ट्रीय मंच पर उठाया। यह आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का महत्वपूर्ण मोड़ था।

1943 का बंगाल अकाल किसानों और आम जनता के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ। लाखों लोग भूख से मर गए। ब्रिटिश नीतियों ने कृषि को व्यापारिक बना दिया, जिससे खाद्यान्न संकट और गहरा गया।

5. स्वतंत्रता के बाद कृषि सुधार

1947 में स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने कृषि सुधारों की दिशा में कदम उठाए। जमींदारी प्रथा को समाप्त किया गया और भूमि सुधार कानून बनाए गए। किसानों को भूमि का स्वामित्व देने का प्रयास किया गया।

1960 के दशक में देश को खाद्यान्न संकट का सामना करना पड़ा। इस स्थिति से निपटने के लिए हरित क्रांति की शुरुआत की गई। हरित क्रांति के दौरान उच्च उत्पादक किस्म के बीज, रासायनिक उर्वरक और आधुनिक सिंचाई तकनीकों का उपयोग बढ़ा। इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कृषि उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गेहूं और चावल का उत्पादन कई गुना बढ़ा। भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बन गया।

6. आधुनिक भारत में किसान की चुनौतियां

आज भारतीय किसान तकनीकी रूप से पहले से अधिक सशक्त है। ट्रैक्टर, हार्वेस्टर और उन्नत बीजों का उपयोग बढ़ा है। सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), फसल बीमा योजना और किसान सम्मान निधि जैसी योजनाएं चलाई जा रही हैं।

फिर भी किसान कई समस्याओं से जूझ रहे हैं:

  1. भूमि का छोटा आकार

  2. बढ़ती लागत और कम लाभ

  3. जलवायु परिवर्तन

  4. कर्ज का बोझ

  5. बाजार में अस्थिरता

2020-21 में कृषि कानूनों के विरोध में बड़े पैमाने पर किसान आंदोलन हुआ, जिसने यह दिखाया कि किसान आज भी अपने अधिकारों के लिए एकजुट हो सकते हैं।

7. सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

भारतीय समाज में किसान को ‘अन्नदाता’ कहा जाता है। बैसाखी, पोंगल, ओणम और मकर संक्रांति जैसे त्योहार कृषि से जुड़े हैं। साहित्य, लोकगीत और फिल्मों में किसान के जीवन और संघर्ष को प्रमुखता से दर्शाया गया है।

ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है। किसान न केवल भोजन उत्पन्न करता है, बल्कि रोजगार और कुटीर उद्योगों को भी बढ़ावा देता है।

8. भविष्य की दिशा

भविष्य में भारतीय कृषि को टिकाऊ बनाना आवश्यक है। जैविक खेती, जल संरक्षण, फसल विविधीकरण और डिजिटल तकनीक का उपयोग बढ़ाना होगा। किसानों को शिक्षा, प्रशिक्षण और बाजार तक सीधी पहुंच देने की आवश्यकता है।

सरकार और समाज को मिलकर ऐसी नीतियां बनानी होंगी, जिससे किसान की आय बढ़े और उसका जीवन स्तर सुधरे।

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