पर्यावरण हमारे जीवन का आधार है। जिस वायु में हम साँस लेते हैं, जिस जल को हम पीते हैं और जिस भूमि पर हम जीवनयापन करते हैं, वह सब पर्यावरण का ही हिस्सा है। यदि पर्यावरण संतुलित और स्वच्छ रहेगा तो मानव जीवन सुरक्षित और स्वस्थ रहेगा। परंतु वर्तमान समय में तेजी से बढ़ती जनसंख्या, औद्योगीकरण, शहरीकरण और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण पर्यावरण असंतुलित हो रहा है। इसीलिए पर्यावरण संरक्षण आज के युग की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है।
पर्यावरण का अर्थ और महत्व
पर्यावरण शब्द “परि” और “आवरण” से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है – वह आवरण जो हमें चारों ओर से घेरे हुए है। इसमें वायु, जल, भूमि, वनस्पति, जीव-जंतु और प्राकृतिक संसाधन सम्मिलित हैं। ये सभी तत्व मिलकर जीवन का संतुलन बनाए रखते हैं। यदि इनमें से किसी एक तत्व में भी असंतुलन आता है, तो उसका प्रभाव पूरे जीवन-चक्र पर पड़ता है।
पर्यावरण हमें भोजन, जल, वायु और आश्रय प्रदान करता है। पेड़-पौधे हमें ऑक्सीजन देते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं। नदियाँ और झीलें हमें जल प्रदान करती हैं। वन्यजीव पारिस्थितिक तंत्र का संतुलन बनाए रखते हैं। इस प्रकार पर्यावरण के बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं है।
पर्यावरण प्रदूषण के कारण
आज पर्यावरण को अनेक प्रकार के प्रदूषणों का सामना करना पड़ रहा है, जैसे वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और भूमि प्रदूषण।
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वायु प्रदूषण – वाहनों से निकलने वाला धुआँ, कारखानों की गैसें और जंगलों की कटाई वायु को दूषित कर रही हैं। इससे श्वास संबंधी रोग बढ़ रहे हैं।
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जल प्रदूषण – उद्योगों का अपशिष्ट, प्लास्टिक कचरा और रासायनिक पदार्थ नदियों और समुद्रों को प्रदूषित कर रहे हैं।
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भूमि प्रदूषण – प्लास्टिक, रासायनिक खाद और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से भूमि की उर्वरता कम हो रही है।
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ध्वनि प्रदूषण – वाहनों, लाउडस्पीकर और मशीनों से उत्पन्न शोर मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।
इन सब कारणों से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्या उत्पन्न हो रही है।
जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग
औद्योगिक गतिविधियों और जीवाश्म ईंधनों के उपयोग से वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ रही है। इससे पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिसे ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं। इसके परिणामस्वरूप हिमनद पिघल रहे हैं, समुद्र का स्तर बढ़ रहा है और प्राकृतिक आपदाओं की संख्या में वृद्धि हो रही है।
अनियमित वर्षा, सूखा और बाढ़ जैसी घटनाएँ पर्यावरण असंतुलन के संकेत हैं। यदि समय रहते पर्यावरण संरक्षण के उपाय नहीं किए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
वन संरक्षण का महत्व
वन पर्यावरण के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। वे न केवल ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, बल्कि वर्षा चक्र को भी नियंत्रित करते हैं। वन्यजीवों का जीवन भी वनों पर निर्भर करता है। परंतु तेजी से हो रही वनों की कटाई के कारण जैव विविधता खतरे में है।
हमें अधिक से अधिक वृक्षारोपण करना चाहिए और अवैध कटाई पर रोक लगानी चाहिए। “एक व्यक्ति – एक पेड़” का संकल्प लेकर हम पर्यावरण संरक्षण में योगदान दे सकते हैं।
जल संरक्षण की आवश्यकता
जल जीवन का आधार है। पृथ्वी पर जल की मात्रा सीमित है, और उसका अधिकांश भाग खारा है। पीने योग्य जल बहुत कम मात्रा में उपलब्ध है। इसलिए जल का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।
वर्षा जल संचयन, पानी की बर्बादी रोकना और नदियों को स्वच्छ रखना हमारे कर्तव्य हैं। हमें जल स्रोतों को प्रदूषित होने से बचाना चाहिए और जल का उपयोग सोच-समझकर करना चाहिए।
प्लास्टिक मुक्त जीवन
प्लास्टिक पर्यावरण के लिए एक गंभीर खतरा है। यह न तो आसानी से नष्ट होता है और न ही भूमि में मिल पाता है। इससे भूमि और जल दोनों प्रदूषित होते हैं। समुद्री जीव भी प्लास्टिक के कारण प्रभावित होते हैं।
हमें प्लास्टिक के उपयोग को कम करना चाहिए और कपड़े या जूट के थैलों का प्रयोग करना चाहिए। पुनर्चक्रण (रिसाइक्लिंग) की आदत अपनाकर हम कचरे को कम कर सकते हैं।
नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग
पर्यावरण संरक्षण के लिए हमें सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जल विद्युत जैसी नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों का अधिक उपयोग करना चाहिए। इससे प्रदूषण कम होगा और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण होगा। जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करके हम स्वच्छ और सुरक्षित भविष्य की ओर बढ़ सकते हैं।
जन-जागरूकता और शिक्षा
पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। हमें बच्चों को बचपन से ही पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाना चाहिए। विद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए।
स्वच्छता अभियान, वृक्षारोपण कार्यक्रम और पर्यावरण दिवस जैसे आयोजन लोगों में जागरूकता फैलाने में सहायक होते हैं। जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यों को समझेगा, तभी पर्यावरण संरक्षण संभव होगा।
सरकार और समाज की भूमिका
सरकार ने पर्यावरण संरक्षण के लिए अनेक कानून और योजनाएँ बनाई हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, वन संरक्षण अधिनियम और प्लास्टिक प्रतिबंध जैसे कदम उठाए गए हैं। परंतु इन कानूनों का पालन तभी संभव है, जब नागरिक भी सहयोग करें।
समाज को भी आगे आकर पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभानी चाहिए। उद्योगों को पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों का उपयोग करना चाहिए और अपशिष्ट प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिए।
निष्कर्ष
अंततः कहा जा सकता है कि पर्यावरण संरक्षण मानव अस्तित्व के लिए अनिवार्य है। यदि पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, तो हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा। हमें अपने छोटे-छोटे प्रयासों से भी बड़ा परिवर्तन लाने का प्रयास करना चाहिए।
पेड़ लगाना, जल बचाना, प्लास्टिक का कम उपयोग करना और स्वच्छता बनाए रखना जैसे कदम पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। हमें यह समझना होगा कि पृथ्वी केवल हमारी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की भी है। इसलिए हमें इसे सुरक्षित और स्वच्छ बनाए रखना चाहिए।
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