भारत का स्वतंत्रता संग्राम एक लंबा और प्रेरणादायक अध्याय है, जिसमें कई वीर पुरुष और महिलाएं अपने साहस और बलिदान से देश को स्वतंत्र कराने के लिए संघर्ष करते रहे। इस संघर्ष में महात्मा गांधी का योगदान अनूठा और असाधारण था। उन्होंने केवल सत्ता प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों के आधार पर आंदोलन की नींव रखी। गांधी जी का अहिंसा आधारित आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह पक्ष है, जिसने पूरे विश्व को प्रेरित किया और दिखाया कि अहिंसा भी एक शक्तिशाली हथियार हो सकती है।
1. महात्मा गांधी का जीवन परिचय
मोहनदास करमचंद गांधी, जिन्हें हम सामान्यतः महात्मा गांधी के नाम से जानते हैं, का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर, गुजरात में हुआ था। उनके पिता करमचंद गांधी एक राजनीतिक और सामाजिक रूप से सक्रिय व्यक्ति थे, जबकि उनकी माता पुतलीबाई धार्मिक और संयमी प्रवृत्ति की महिला थीं। बचपन से ही गांधी जी में सादगी, सत्यप्रियता और धार्मिक आस्था की भावना विकसित हुई।
गांधी जी ने कानून की पढ़ाई इंग्लैंड से की और वकालत का पेशा अपनाया। 1893 में उन्हें दक्षिण अफ्रीका जाने का अवसर मिला। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने भारतीयों के साथ होने वाले भेदभाव, अन्याय और नस्ली भेदभाव का सामना किया। यह अनुभव उनके जीवन का वह मोड़ बन गया, जिसने उन्हें सत्य और अहिंसा के सिद्धांत पर आधारित आंदोलन के लिए प्रेरित किया।
2. दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी का संघर्ष
दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी ने भारतीयों के अधिकारों की रक्षा के लिए कई आंदोलनों का नेतृत्व किया। यहाँ उन्होंने सत्याग्रह का सिद्धांत विकसित किया। सत्याग्रह का अर्थ है “सत्य के लिए संघर्ष और अहिंसा के माध्यम से विरोध करना।”
उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के खिलाफ बनाए गए भेदभावपूर्ण कानूनों के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध किया। उदाहरण के लिए, भारतीयों से विशेष पहचान पत्र माँगे जाने, मतदान और जमीन खरीदने में प्रतिबंध जैसी समस्याओं का उन्होंने अहिंसात्मक विरोध किया। उन्होंने विरोध के दौरान कभी हिंसा का सहारा नहीं लिया और केवल धैर्य, संयम और सत्य के माध्यम से अपने उद्देश्य को प्राप्त किया।
3. सत्याग्रह और अहिंसा का सिद्धांत
गांधी जी का मुख्य दर्शन सत्याग्रह और अहिंसा पर आधारित था। उन्होंने इसे केवल एक राजनीतिक रणनीति नहीं बल्कि एक जीवन दर्शन के रूप में देखा। उनके अनुसार:
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सत्य का पालन – किसी भी परिस्थिति में सच्चाई का अनुसरण करना।
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अहिंसा – किसी भी विरोध या संघर्ष में हिंसा का प्रयोग न करना।
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धैर्य और संयम – लंबी अवधि के संघर्ष में मानसिक और शारीरिक स्थिरता बनाए रखना।
गांधी जी मानते थे कि हिंसा से भले ही तत्काल परिणाम मिलें, लेकिन दीर्घकाल में यह समाज को और अधिक विभाजित और अस्थिर कर देती है। इसलिए उन्होंने अहिंसा को सशक्त और प्रभावी राजनीतिक हथियार के रूप में प्रस्तुत किया।
4. भारत में गांधी जी का आगमन और आंदोलनों की शुरुआत
1915 में गांधी जी भारत लौटे। इस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और देश में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याएँ गहरी थीं। गांधी जी ने सबसे पहले किसानों, मजदूरों और असहाय जनता की समस्याओं को समझा और उनके लिए आंदोलन शुरू किया।
उनकी प्रमुख पहलें इस प्रकार थीं:
4.1 चंपारण सत्याग्रह (1917)
बिहार के चंपारण जिले में किसानों को टेना या बागान कानूनों के तहत अत्याचार का सामना करना पड़ रहा था। किसानों को अंग्रेज़ी साहूकारों के लिए उगाही और जमीनी नियमों का पालन करना पड़ता था। गांधी जी ने किसानों के अधिकारों के लिए अहिंसात्मक आंदोलन किया। उन्होंने किसानों के साथ रहकर उनकी समस्या समझी और अंग्रेज़ अधिकारियों के सामने सत्याग्रह का प्रयोग किया।
इस आंदोलन में सफलता मिली और किसानों को राहत मिली।
4.2 खेड़ा सत्याग्रह (1918)
गुजरात के खेड़ा जिले में किसानों पर भारी कर लगाया गया था। महामारी और फसल खराब होने के बावजूद कर वसूली की गई। गांधी जी ने किसानों के साथ मिलकर कर माफी की मांग की और अहिंसा के माध्यम से अंग्रेज़ सरकार को दबाव में लाया। इस आंदोलन की सफलता ने गांधी जी की लोकप्रियता बढ़ा दी।
4.3 असहयोग आंदोलन (1920-1922)
असहयोग आंदोलन में गांधी जी ने भारतीय जनता से ब्रिटिश शिक्षा संस्थानों, अदालतों और सरकारी नौकरियों का बहिष्कार करने का आह्वान किया। इस आंदोलन का उद्देश्य था ब्रिटिश शासन को कमजोर करना और भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना जगाना।
इस आंदोलन में लाखों लोग शामिल हुए। गांधी जी ने कहा कि हिंसा का प्रयोग नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण विरोध ही स्वतंत्रता की कुंजी है।
4.4 नमक सत्याग्रह (1930)
नमक कर कानून के खिलाफ गांधी जी ने डांडी मार्च किया। 12 मार्च 1930 को गांधी जी और उनके अनुयायियों ने साबरमती आश्रम से डांडी तक मार्च किया और समुद्र से नमक तैयार किया। यह क्रांतिकारी कदम ब्रिटिश कानून का अहिंसात्मक विरोध था।
नमक सत्याग्रह ने पूरे भारत में जनता को एकजुट किया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ अहिंसात्मक आंदोलन की मिसाल स्थापित की।
4.5 भारत छोड़ो आंदोलन (1942)
दूसरी विश्वयुद्ध के दौरान, गांधी जी ने “करो या मरो” के नारे के साथ भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया। उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य से पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की। इस आंदोलन में भी उन्होंने हिंसा का त्याग किया और शांतिपूर्ण विरोध के माध्यम से अंग्रेज़ों को दबाव में लाने का प्रयास किया।
5. अहिंसा आधारित आंदोलन के प्रभाव
गांधी जी के अहिंसा आधारित आंदोलन का प्रभाव केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक और मानसिक रूप से भी व्यापक था।
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राष्ट्र एकता – हिंदू-मुस्लिम, अमीर-गरीब और उच्च-निच समाज में एकता का संदेश।
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सामाजिक सुधार – अस्पृश्यता, बाल विवाह और जातिवाद के खिलाफ आंदोलन।
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विश्व में अहिंसा की छवि – गांधी जी ने विश्व को दिखाया कि बिना हिंसा के भी सत्ता विरोध संभव है।
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नेतृत्व का आदर्श – जनता और नेताओं के लिए सत्य और नैतिकता का मार्गदर्शन।
6. गांधी जी का जीवन और अंतिम दिन
महात्मा गांधी का जीवन सत्य, अहिंसा और सादगी का प्रतीक था। उन्होंने कहा था, “हिंसा छोड़ो, प्रेम अपनाओ। प्रेम से बड़ा कोई धर्म नहीं।”
30 जनवरी 1948 को गांधी जी की हत्या हुई। उनके संघर्ष और दर्शन ने केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व को प्रेरित किया। मार्टिन लूथर किंग जूनियर, नेल्सन मंडेला जैसे विश्व नेता भी उनके अहिंसा आधारित दर्शन से प्रेरित हुए।
7. निष्कर्ष
गांधी जी और उनका अहिंसा आधारित आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे प्रभावशाली पहलू था। उन्होंने दिखाया कि सत्य और अहिंसा से बड़े-बड़े शासन को भी चुनौती दी जा सकती है। उनका आंदोलन केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था, बल्कि यह सामाजिक न्याय, नैतिकता और मानवता का संदेश भी देता है।
गांधी जी की विचारधारा आज भी प्रासंगिक है। उनके सिद्धांत यह सिखाते हैं कि कठिन समय में भी सत्य, धैर्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं का समाधान संभव है।
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