डॉ.
भीमराव
अंबेडकर भारत
के
महान
समाज
सुधारक,
विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री और
राजनीतिज्ञ थे।
उन्हें
भारतीय
संविधान का
मुख्य
शिल्पकार तथा
"भारतीय
संविधान के
जनक"
के
रूप
में
जाना
जाता
है।
उन्होंने अपना
पूरा
जीवन
समाज
में
समानता,
न्याय
और
मानव
अधिकारों की
स्थापना के
लिए
समर्पित कर
दिया।
भारतीय
संविधान के
निर्माण में
उनका
योगदान
अत्यंत
महत्वपूर्ण और
ऐतिहासिक है।
डॉ.
भीमराव
अंबेडकर का
जन्म
14 अप्रैल
1891 को
मध्य
प्रदेश
के
महू
(वर्तमान डॉ.
अंबेडकर नगर)
में
हुआ
था।
उनका
परिवार
सामाजिक रूप
से
पिछड़े
वर्ग
से
संबंधित था।
बचपन
में
उन्हें
अनेक
कठिनाइयों और
भेदभाव
का
सामना
करना
पड़ा।
इसके
बावजूद
उन्होंने शिक्षा
को
अपना
सबसे
बड़ा
हथियार
बनाया।
उन्होंने भारत
और
विदेश
के
प्रतिष्ठित शिक्षण
संस्थानों से
उच्च
शिक्षा
प्राप्त की।
उनकी
विद्वता, दूरदर्शिता और
कानूनी
ज्ञान
ने
उन्हें
देश
के
प्रमुख
नेताओं
में
शामिल
कर
दिया।
भारत
की
स्वतंत्रता के
बाद
संविधान निर्माण का
कार्य
प्रारंभ हुआ।
संविधान सभा
ने
29 अगस्त
1947 को
प्रारूप समिति
(Drafting Committee) का
गठन
किया
और
डॉ.
भीमराव
अंबेडकर को
उसका
अध्यक्ष नियुक्त किया।
यह
उनके
ज्ञान,
नेतृत्व क्षमता
और
संविधान संबंधी
समझ
का
प्रमाण
था।
उनके
नेतृत्व में
प्रारूप समिति
ने
विभिन्न देशों
के
संविधानों का
अध्ययन
किया
और
भारत
की
परिस्थितियों के
अनुरूप
संविधान का
मसौदा
तैयार
किया।
डॉ.
अंबेडकर का
मानना
था
कि
किसी
भी
लोकतांत्रिक राष्ट्र की
सफलता
उसके
संविधान की
मजबूती
और
नागरिकों को
दिए
गए
अधिकारों पर
निर्भर
करती
है।
इसलिए
उन्होंने संविधान में
समानता,
स्वतंत्रता, न्याय
और
बंधुत्व के
सिद्धांतों को
विशेष
महत्व
दिया।
भारतीय
संविधान में
प्रत्येक नागरिक
को
कानून
के
समक्ष
समानता,
अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता, धर्म
की
स्वतंत्रता तथा
शिक्षा
और
रोजगार
के
समान
अवसर
प्रदान
किए
गए
हैं।
संविधान में
मौलिक
अधिकारों को
शामिल
करने
में
डॉ.
अंबेडकर की
महत्वपूर्ण भूमिका
रही।
उन्होंने यह
सुनिश्चित किया
कि
देश
का
कोई
भी
नागरिक
जाति,
धर्म,
लिंग
या
भाषा
के
आधार
पर
भेदभाव
का
शिकार
न
हो।
उन्होंने सामाजिक न्याय
को
संविधान का
आधार
बनाया।
अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और
अन्य
पिछड़े
वर्गों
के
उत्थान
के
लिए
विशेष
प्रावधान किए
गए
ताकि
समाज
के
कमजोर
वर्ग
भी
विकास
की
मुख्यधारा में
शामिल
हो
सकें।
डॉ.
अंबेडकर लोकतंत्र के
प्रबल
समर्थक
थे।
उनका
विश्वास था
कि
लोकतंत्र केवल
शासन
प्रणाली नहीं,
बल्कि
जीवन
जीने
का
एक
तरीका
है।
उन्होंने संविधान में
संसदीय
लोकतंत्र की
व्यवस्था का
समर्थन
किया,
जिसमें
जनता
अपने
प्रतिनिधियों का
चुनाव
करती
है
और
सरकार
जनता
के
प्रति
उत्तरदायी होती
है।
उन्होंने स्वतंत्र न्यायपालिका और
संघीय
शासन
व्यवस्था को
भी
संविधान का
महत्वपूर्ण भाग
बनाया।
भारतीय
संविधान को
संविधान सभा
ने
26 नवंबर
1949 को
अपनाया। इसके
बाद
26 जनवरी
1950 को
इसे
पूरे
देश
में
लागू
किया
गया।
यह
दिन
भारत
के
इतिहास
में
गणतंत्र दिवस
के
रूप
में
मनाया
जाता
है।
संविधान लागू
होने
के
साथ
ही
भारत
एक
संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और
लोकतांत्रिक गणराज्य बन
गया।
डॉ.
अंबेडकर ने
संविधान सभा
में
अपने
अंतिम
भाषण
में
संविधान की
सफलता
के
लिए
नागरिकों को
संविधान का
सम्मान
करने
और
लोकतांत्रिक मूल्यों को
अपनाने
की
सलाह
दी
थी।
उन्होंने चेतावनी दी
थी
कि
यदि
सामाजिक और
आर्थिक
असमानताएँ बनी
रहीं,
तो
लोकतंत्र कमजोर
हो
सकता
है।
इसलिए
उन्होंने समाज
में
समानता
और
भाईचारे की
भावना
को
बढ़ावा
देने
पर
जोर
दिया।
डॉ.
भीमराव
अंबेडकर का
संविधान निर्माण में
योगदान
अमूल्य
है।
उनके
प्रयासों के
कारण
भारत
को
एक
ऐसा
संविधान मिला
जो
विश्व
के
सबसे
बड़े
लोकतंत्र की
नींव
बना।
आज
भी
भारतीय
संविधान देश
की
एकता,
अखंडता
और
लोकतांत्रिक व्यवस्था को
मजबूत
बनाए
हुए
है।
डॉ.
अंबेडकर के
विचार
और
आदर्श
हमें
न्याय,
समानता
और
मानवता
का
संदेश
देते
हैं।
अंततः
कहा
जा
सकता
है
कि
डॉ.
भीमराव
अंबेडकर केवल
संविधान निर्माता ही
नहीं,
बल्कि
आधुनिक
भारत
के
निर्माता भी
थे।
भारतीय
संविधान उनके
ज्ञान,
दूरदर्शिता और
सामाजिक न्याय
के
प्रति
समर्पण
का
जीवंत
प्रमाण
है।
राष्ट्र उनके
योगदान
को
सदैव
सम्मान
और
कृतज्ञता के
साथ
याद
करता
रहेगा।