थ्वी पर पाए जाने वाले जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की संख्या करोड़ों में है। प्रत्येक जीव की बनावट, आकार, निवास स्थान, भोजन, प्रजनन तथा अन्य जैविक विशेषताएँ अलग-अलग होती हैं। इन विविध जीवों का अध्ययन तभी सरल और व्यवस्थित रूप से किया जा सकता है जब उन्हें समान विशेषताओं के आधार पर विभिन्न समूहों में बाँटा जाए। जीवों को उनकी समानताओं एवं असमानताओं के आधार पर अलग-अलग वर्गों में बाँटने की प्रक्रिया को जीवों का वर्गीकरण (Classification of Living Organisms) कहा जाता है। वर्गीकरण जीव विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा है, जो वैज्ञानिकों को जीवों की पहचान, नामकरण तथा उनके पारस्परिक संबंधों को समझने में सहायता करती है।
प्राचीन काल में जीवों का वर्गीकरण केवल बाहरी संरचना के आधार पर किया जाता था, परंतु आधुनिक विज्ञान में कोशिका संरचना, आनुवंशिकी, विकासक्रम (Evolution), जैव-रासायनिक गुणों तथा डीएनए विश्लेषण के आधार पर अधिक वैज्ञानिक वर्गीकरण किया जाता है।
जीवों के वर्गीकरण की आवश्यकता
जीवों का वर्गीकरण निम्नलिखित कारणों से आवश्यक है—
- जीवों का अध्ययन सरल एवं व्यवस्थित हो जाता है।
- विभिन्न जीवों की पहचान करना आसान हो जाता है।
- जीवों के बीच समानता एवं असमानता का ज्ञान प्राप्त होता है।
- जीवों के विकासक्रम (Evolutionary Relationship) को समझने में सहायता मिलती है।
- वैज्ञानिक अनुसंधान एवं नई प्रजातियों की खोज में सुविधा होती है।
- सभी देशों में जीवों की पहचान के लिए एक समान वैज्ञानिक प्रणाली उपलब्ध होती है।
वर्गिकी (Taxonomy)
जीवों की पहचान, नामकरण और वर्गीकरण का अध्ययन वर्गिकी (Taxonomy) कहलाता है। इस विज्ञान का विकास स्वीडन के प्रसिद्ध वैज्ञानिक कैरोलस लिनियस (Carolus Linnaeus) ने किया, इसलिए उन्हें वर्गिकी का जनक (Father of Taxonomy) कहा जाता है।
वर्गिकी के मुख्य कार्य
- जीवों की पहचान (Identification)
- नामकरण (Nomenclature)
- वर्गीकरण (Classification)
द्विनाम पद्धति (Binomial Nomenclature)
कैरोलस लिनियस ने जीवों के वैज्ञानिक नाम रखने के लिए द्विनाम पद्धति का विकास किया। इस पद्धति में प्रत्येक जीव का नाम दो शब्दों से मिलकर बनता है—
- पहला शब्द — वंश (Genus)
- दूसरा शब्द — जाति (Species)
उदाहरण—
- मनुष्य – Homo sapiens
- आम – Mangifera indica
- शेर – Panthera leo
द्विनाम पद्धति के नियम
- वैज्ञानिक नाम लैटिन भाषा में लिखे जाते हैं।
- पहला शब्द (वंश) का पहला अक्षर बड़ा तथा दूसरा शब्द (जाति) छोटे अक्षरों में लिखा जाता है।
- मुद्रित पुस्तक में नाम तिरछे (Italic) अक्षरों में तथा हस्तलिखित रूप में दोनों शब्दों को अलग-अलग रेखांकित किया जाता है।
वर्गीकरण के आधार
जीवों का वर्गीकरण निम्न आधारों पर किया जाता है—
- कोशिका की संरचना
- कोशिकाओं की संख्या
- पोषण की विधि
- शरीर संगठन
- प्रजनन की विधि
- विकासक्रम
- आनुवंशिक समानताएँ
वर्गीकरण की श्रेणियाँ (Taxonomic Categories)
जीवों को निम्नलिखित क्रम में वर्गीकृत किया जाता है—
- जगत (Kingdom)
- संघ (Phylum) / विभाग (Division)
- वर्ग (Class)
- गण (Order)
- कुल (Family)
- वंश (Genus)
- जाति (Species)
उदाहरण – मनुष्य का वर्गीकरण
- जगत – Animalia
- संघ – Chordata
- वर्ग – Mammalia
- गण – Primates
- कुल – Hominidae
- वंश – Homo
- जाति – Homo sapiens
पाँच-जगत वर्गीकरण
1969 में वैज्ञानिक आर. एच. व्हिटेकर (R. H. Whittaker) ने जीवों का पाँच-जगत वर्गीकरण प्रस्तुत किया। यह आधुनिक जीव विज्ञान में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
पाँच जगत निम्नलिखित हैं—
- मोनेरा (Monera)
- प्रोटिस्टा (Protista)
- कवक (Fungi)
- पादप (Plantae)
- जंतु (Animalia)
1. मोनेरा (Monera)
यह सबसे सरल एवं आदिम जीवों का समूह है।
प्रमुख विशेषताएँ
- एककोशिकीय जीव
- केंद्रक झिल्ली अनुपस्थित
- प्रोकैरियोटिक कोशिका
- अलैंगिक जनन
- कुछ स्वपोषी तथा कुछ परपोषी
उदाहरण
- बैक्टीरिया
- सायनोबैक्टीरिया
- माइकोप्लाज्मा
2. प्रोटिस्टा (Protista)
इस जगत में एककोशिकीय यूकैरियोटिक जीव शामिल होते हैं।
विशेषताएँ
- वास्तविक केंद्रक उपस्थित
- अधिकांश जलीय
- स्वपोषी एवं परपोषी दोनों प्रकार
- लैंगिक एवं अलैंगिक दोनों प्रकार का जनन
उदाहरण
- अमीबा
- पैरामीशियम
- यूग्लीना
- डायटम
3. कवक (Fungi)
कवक क्लोरोफिल रहित परपोषी जीव हैं।
विशेषताएँ
- कोशिका भित्ति काइटिन की बनी होती है।
- भोजन अवशोषण द्वारा प्राप्त करते हैं।
- बीजाणुओं द्वारा जनन।
- मृत जीवों पर उगने वाले सैप्रोफाइट भी होते हैं।
उदाहरण
- मशरूम
- यीस्ट
- पेनिसिलियम
- राइजोपस