दानवीर कर्ण
दान की गंगा बहती थी,
कर्ण के पावन द्वार।
जो भी आया खाली झोली,
लौटा नहीं लाचार।
सूर्यपुत्र कहलाए कर्ण,
वीरता जिसकी पहचान।
अपने सुख का त्याग किया,
रखा सदा सबका मान।
कवच-कुंडल दान किए,
हँसकर दिया उपहार।ऐसे दानी वीर को,
नमन करे संसार
जन्म लिया तो माँ ने छोड़ा,
जीते जी सम्मान न पाया,
फिर भी तू भगवान रहा
नदिया की लहरों ने मोड़ा।
किस्मत ने हर मोड़ पर,
कर्ण का दिल ही तोड़ा।
अपनों से था दूर हमेशा,
फिर भी सबसे प्यार किया।
दुनिया ने ताने दिए मगर,
उसने सब स्वीकार किया
ओ दानवीर, ओ सूर्यपुत्र,
तेरा दर्द महान रहा।जीते जी सम्मान न पाया,
फिर भी तू भगवान रहा
अकेला आया, अकेला गया,
यही कर्ण की कहानी है।दर्द, त्याग और बलिदानों की,
यह अमर निशानी है।