भारतीय उपमहाद्वीप की प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत में कुछ ऐसे जीव पाए जाते हैं जो केवल जैविक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि भावनात्मक और सांस्कृतिक स्तर पर भी गहरी छाप छोड़ते हैं। मोर, जिसे अंग्रेज़ी में Peacock कहा जाता है, ऐसा ही एक पक्षी है जो अपनी अनूठी सुंदरता, शालीनता, रंगों की चमक और रहस्यमयी नृत्य के कारण विश्व-भर में प्रसिद्ध है। भारत में तो मोर को केवल एक पक्षी न मानकर सौभाग्य, समृद्धि, शक्ति और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। यह भारत का राष्ट्रीय पक्षी (National Bird of India) भी है।
मोर की पहचान सिर्फ उसके चमकदार पंखों और आकर्षक पंखों वाले पंखे से नहीं है, बल्कि उसकी सामाजिक आदतों, पारिस्थितिक महत्व और ऐतिहासिक-धार्मिक प्रभाव से भी है। इस लेख में हम मोर के जीवन, विशेषताओं, व्यवहार, धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व, संरक्षण व्यवस्था और पारिस्थितिक भूमिका पर विस्तृत चर्चा करेंगे।
1. मोर का परिचय
मोर का वैज्ञानिक नाम Pavo cristatus है और यह फेसियानिडे (Phasianidae) परिवार का सदस्य है। मोर मुख्यतः भारत, श्रीलंका और दक्षिण एशिया के अन्य क्षेत्रों में पाया जाता है। नर मोर को “Peacock”, मादा को “Peahen” और दोनों को मिलाकर “Peafowl” कहा जाता है। भारत में मोर प्रायः जंगलों, कृषि-क्षेत्रों, नदी किनारों, तथा खुले पेड़ों वाली जगहों में बड़ी संख्या में पाए जाते हैं।
एक नर मोर की खास पहचान उसका लम्बा, रंगीन और चमकदार पूंछपंख (train) है, जो लगभग 4–5 फीट तक लंबा हो सकता है। यह पूंछपंख मोर के शरीर की असल पूंछ नहीं होता, बल्कि लंबी पीठवालों से बनता है जो अपने आकर्षक रंगों के कारण दूर से ही नजर आ जाता है।
2. मोर की शारीरिक बनावट
मोर एक मध्यम आकार का पक्षी है जिसकी ऊँचाई 3 से 4 फीट तक और वजन 4 से 6 किलोग्राम तक होता है। इसकी बनावट निम्न विशेषताओं से पहचानी जाती है:
(1) चमकदार पंख – प्रकृति की रंगो-की-पैलेट
मोर के पंखों में नीला, हरा, सुनहरा, इंडिगो, फ़िरोज़ी और बैंगनी जैसे रंग चमकते हैं। इन रंगों का कारण किसी प्रकार का पिगमेंट नहीं बल्कि स्ट्रक्चरल कलरिंग है—यानी प्रकाश पंखों की सूक्ष्म संरचना पर पड़कर रंगों की चमक पैदा करता है।
(2) मुकुट (Crest)
मोर और मोरनी दोनों के सिर पर पंखों का एक छोटा-सा ताजनुमा मुकुट होता है। नर का मुकुट बड़ा और लहरदार दिखता है, जबकि मादा का अपेक्षाकृत छोटा होता है।
(3) मोरनी की बनावट
मोरनी की सुंदरता सिंपल होती है। वह भूरे, धूसर और हल्के हरे रंग की होती है। उसके पास नर मोर जैसी लम्बी पूंछ नहीं होती। इसके बावजूद वह काफी आकर्षक और सजीली दिखाई देती है।
(4) पंखों का “आई-स्पॉट”
मोर के पंखों पर बनी आंख जैसी आकृतियाँ (Eye Spots) उसकी पहचान हैं। इन्हीं पंखों को फैलाकर मोर एक विशाल गोलाकार पंखा बनाता है जो प्रजनन नृत्य के दौरान बेहद सुंदर दिखाई देता है।
3. मोर का जीवन और व्यवहार
मोर केवल सुंदर ही नहीं, बल्कि काफी बुद्धिमान और सामाजिक पक्षी भी है। उसके व्यवहार की कई रोचक बातें हैं।
(1) नृत्य – प्रकृति का अद्भुत दृश्य
मोर का नृत्य दुनियाभर में प्रसिद्ध है। यह प्रजनन काल यानी मानसून के समय खासकर देखा जाता है।
मोर अपने लम्बे पंखे को ऊपर उठाकर गोल आकार देता है और फिर उसे हिलाते हुए एक अनोखा कंपन पैदा करता है। कहा जाता है कि इस नृत्य का उद्देश्य मोरनी को आकर्षित करना और अपनी शक्ति दिखाना है।
(2) आवाज़ – “की-आँ” की तीखी पुकार
मोर की आवाज़ तेज़, तीखी और पहचानने योग्य होती है। यह बारिश से पहले अधिक सुनाई देती है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अक्सर कहते हैं—
“मोर बोला तो समझो बारिश आने वाली है।”
(3) झुंड में रहना
मोर छोटे-छोटे समूह बनाकर रहते हैं, जिनमें एक से अधिक मादाएँ और एक प्रमुख नर शामिल होता है। ये समूह जमीन पर खाना ढूंढते हैं और रात में ऊँचे पेड़ों पर सोते हैं।
(4) उड़ने की क्षमता
यद्यपि मोर भारी पक्षी है, फिर भी वह थोड़ी दूरी तक बेहद तेजी से उड़ सकता है, खासकर खतरे के समय।
4. मोर का भोजन
मोर का आहार मिश्रित होता है। यह सर्वाहारी (Omnivorous) होता है।
इसके प्रमुख खाद्य पदार्थ इस प्रकार हैं—
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अनाज, बीज और फल
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कीड़े-मकोड़े
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छोटे साँप और छिपकलियाँ
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घास और पत्तियाँ
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दीमक, टिड्डी आदि
ग्रामीण भारत में मोर को खेतों का रक्षक भी कहा जाता है, क्योंकि यह फसलों को नुक़सान पहुँचाने वाले कीड़ों और छोटे साँपों को खा जाता है।
5. प्रजनन प्रक्रिया
मोर का प्रजनन काल मुख्य रूप से जून से सितंबर तक होता है। मानसून की पहली बारिशों के साथ ही मोर अपने पंख फैलाकर नृत्य करता है। मादा मोर आकर्षित होकर नर को चुनती है।
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मादा एक बार में 3 से 7 अंडे देती है।
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अंडों का ऊष्मायन (Incubation) लगभग 28 दिन चलता है।
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बच्चे जन्म के कुछ घंटों बाद ही चलने लगते हैं और अपनी माँ के साथ घूमने लगते हैं।
6. भारतीय संस्कृति में मोर का महत्व
भारत में मोर हजारों वर्षों से संस्कृति का प्रमुख हिस्सा रहा है। इसकी सुंदरता और पवित्रता का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों, कला, संगीत और मंदिरों में मिलता है।
(1) धार्मिक महत्व
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भगवान कृष्ण को मोरपंख अत्यंत प्रिय था। उनका मुकुट, जिसे “मोर मुकुट” कहा जाता है, भारतीय संस्कृति में अमर है।
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भगवान कार्तिकेय का वाहन भी मोर है।
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भगवान इंद्र का साथी भी माना गया है, जो बादल और वर्षा का देवता है।
(2) स्वतंत्रता का प्रतीक
मोर की छवि भारतीय डाक टिकटों, राष्ट्रीय प्रतीकों और सरकारी कलाकृतियों में व्यापक रूप से उपयोग की जाती है।
(3) संगीत और नृत्य में उपयोग
कत्थक, भरतनाट्यम और कई लोकनृत्यों में मोर के पंखों और उसके नृत्य की नकल की जाती है।
(4) कला और साहित्य में मोर
भारतीय राजस्थानी, पहाड़ी और मधुबनी कला में मोर का चित्रण प्रचुर मात्रा में मिलता है।
7. पारिस्थितिक महत्व
मोर केवल सांस्कृतिक ही नहीं, बल्कि पारिस्थितिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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यह कीट नियंत्रक का काम करता है।
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खेतों को नुकसान पहुँचाने वाले कीटों, टिड्डों, साँपों का प्राकृतिक शिकारी है।
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जंगलों में यह बीज फैलाव में भी भूमिका निभाता है।
इस प्रकार मोर प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में योगदान देता है।
8. मोर के संरक्षण की जरूरत
हालाँकि भारत में मोर को धार्मिक और सांस्कृतिक संरक्षण मिलता है, फिर भी कुछ समस्याएँ इसे प्रभावित कर रही हैं:
मुख्य खतरे:
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खेती में बढ़ते रसायन और कीटनाशक
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आवास नष्ट होना
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तस्करी और पंखों का अवैध व्यापार
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सड़क दुर्घटनाएँ
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शिकार
भारत में मोर वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 – अनुसूची-I के तहत संरक्षित है। इसे नुकसान पहुँचाना या पकड़ना अपराध है।
9. मोर से जुड़े रोचक तथ्य
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मोर का नृत्य केवल सुंदरता नहीं, बल्कि संचार का माध्यम भी है।
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इसके पंखों पर कम से कम 100–150 आई-स्पॉट्स होते हैं।
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मोर अक्सर बारिश से पहले ज़ोर-ज़ोर से बोलते हैं।
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इसकी उम्र 20 साल तक हो सकती है।
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यह रात में कभी जमीन पर नहीं सोता—हमेशा पेड़ों पर ही सोता है।
10. निष्कर्ष
मोर केवल एक द्वारपाल पक्षी या मनोरंजन का जीव नहीं है। यह प्रकृति, संस्कृति, विज्ञान और आस्था के बीच पुल का काम करता है। इसकी अद्भुत बनावट, रंगों की चमक, बारिश में किया जाने वाला नृत्य और प्रकृति संरक्षण में इसकी भूमिका इसे दुनिया के सबसे अनूठे पक्षियों में स्थान देती है।
भारत का राष्ट्रीय पक्षी होने के नाते मोर हमारी धरोहर का हिस्सा है। हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम इसके habitat को सुरक्षित रखें, इसे प्रेम और संरक्षण दें, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी बारिश की पहली फुहार के साथ मोर के नृत्य का आनंद उठा सकें।
