गौरैया, जिसे अंग्रेज़ी में हाउस स्पैरो (House Sparrow) कहा जाता है, विश्वभर में पाई जाने वाली सबसे परिचित और प्रिय पक्षियों में से एक है। भारत में यह पक्षी घरों की मुंडेरों, खिड़कियों, छतों, पेड़ों की डालियों और खेतों में आमतौर पर देखा जाता था। समय के साथ शहरों की रफ्तार, शहरीकरण और बदलती जीवनशैली ने इस पक्षी की उपस्थिति को काफी प्रभावित किया है। कभी हमारी दिनचर्या का सहज हिस्सा रही यह छोटी-सी चिड़िया आज संरक्षण की प्रतीक बन गई है। प्रस्तुत लेख में गौरैया के जीवन, महत्व, संकट और संरक्षण के प्रयासों का विस्तृत विवेचन किया गया है।
1. गौरैया का परिचय
गौरैया एक छोटा, सामाजिक और अत्यंत सक्रिय पक्षी है। इसका वैज्ञानिक नाम Passer domesticus है। यह पक्षी पासरिडाए (Passeridae) परिवार से संबंध रखता है। इसकी लंबाई लगभग 14–16 सेंटीमीटर, जबकि वजन 24–40 ग्राम तक होता है। नर गौरैया के सिर और गर्दन पर काला और भूरा रंग होता है, जबकि मादा हल्के भूरे और धूसर रंग की दिखाई देती है।
गौरैया की एक ख़ास विशेषता उसकी चंचलता और ‘ची-ची’ जैसी मधुर आवाज़ है, जो सुबह-सुबह वातावरण को जीवंत बना देती है। इसके पंख छोटे और शक्तिशाली होते हैं, जिनसे यह बड़ी फुर्ती से उड़ान भरती है।
2. वितरण और आवास
गौरैया विश्व के लगभग सभी महाद्वीपों में पाई जाती है, विशेषकर:
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एशिया
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यूरोप
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अफ्रीका
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अमेरिका
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ऑस्ट्रेलिया
भारत में यह शहरों, कस्बों और गांवों में खूब मिलती थी और लोगों की दैनिक दिनचर्या का हिस्सा रही है। इसका आवास मनुष्यों के आसपास होता है क्योंकि यह मानव बस्तियों में आसानी से भोजन पा लेती है।
3. गौरैया का आहार
गौरैया का भोजन सरल और विविधतापूर्ण होता है। यह मुख्यतः:
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अनाज
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बीज
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दालें
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कीट-पतंगे
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छोटे कीड़े
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चावल के दाने
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फलों के टुकड़े
खाती है। खासकर प्रजनन के समय यह अपने बच्चों के लिए प्रोटीनयुक्त कीट-पतंगों को प्राथमिकता देती है। कीड़े खाने की यह क्षमता कृषि के लिए अत्यंत लाभदायक है क्योंकि यह फसलों पर लगने वाले कीटों को नियंत्रित करती है।
4. प्रजनन और घोंसला निर्माण
गौरैया आमतौर पर वसंत और गर्मियों के मौसम में प्रजनन करती है। यह घरों की खिड़कियों के कोनों, टाइलों के बीच की जगह, पेड़ों की शाखाओं, बिजली के खंभों, पुराने भवनों की दरारों और किसी भी सुरक्षित कोने में घोंसला बनाती है।
इसका घोंसला आमतौर पर सूखी घास, पत्तों, कागज के टुकड़ों और रुई इत्यादि से बनाया जाता है।
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एक बार में मादा 3–5 अंडे देती है।
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अंडे से बच्चे निकलने में 10–14 दिन लगते हैं।
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बच्चे 2–3 सप्ताह में उड़ान भरने लगते हैं।
5. मनुष्य के जीवन में गौरैया का महत्व
गौरैया सिर्फ एक पक्षी नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा रही है।
(क) पर्यावरणीय महत्व
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यह कीट नियंत्रण में मदद करती है, जिससे फसलें सुरक्षित रहती हैं।
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यह पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
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कीड़े खाकर यह प्राकृतिक खाद्य श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।
(ख) सांस्कृतिक महत्व
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भारतीय घरों में गौरैया का आना शुभ माना जाता है।
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कई लोकगीतों, कविताओं और कहानियों में गौरैया का वर्णन मिलता है।
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गाँवों में बच्चे गौरैया के चहचहाने से दिन की शुरुआत पहचानते थे।
(ग) सामाजिक महत्व
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यह मनुष्यों के सबसे नजदीक रहने वाला पक्षी है।
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इसकी उपस्थिति मनुष्य और प्रकृति के मधुर संबंधों का प्रतीक रही है।
6. गौरैया के घटते अस्तित्व का संकट
पिछले कुछ दशकों में गौरैया की संख्या में तेजी से गिरावट आई है। कई जगहों से यह लगभग गायब हो गई है। इस कमी के पीछे कई कारण हैं:
(क) शहरीकरण और कंक्रीट के जंगल
नए शहरों में बड़े-बड़े भवन, चिकनी दीवारें और ऊंची इमारतें बन रही हैं, जहां गौरैया को घोंसला बनाने की जगह नहीं मिलती। पुराने घरों की निचें, छतें और झिर्रियाँ खत्म हो गई हैं।
(ख) मोबाइल टावरों से निकलने वाला रेडिएशन
कई वैज्ञानिकों के अनुसार उच्च-आवृत्ति वाले रेडिएशन से गौरैया की दिशा-निर्धारण क्षमता प्रभावित हो जाती है और नवजात बच्चों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है।
(ग) कीटनाशकों का बढ़ता प्रयोग
खेतों में कीटनाशकों के उपयोग से कीड़े मर जाते हैं, जो गौरैया का प्रमुख भोजन हैं। इससे भोजन की उपलब्धता कम होती है।
(घ) प्रदूषण
वायु और ध्वनि प्रदूषण भी गौरैया के प्राकृतिक जीवन में बाधा डालता है।
(ङ) भोजन की कमी
फास्ट फूड संस्कृति और पैक्ड खाद्य पदार्थों के बढ़ते उपयोग से घरों में अनाज या टुकड़े कम गिरते हैं, जिससे गौरैया के भोजन का स्रोत भी समाप्त हो रहा है।
7. गौरैया संरक्षण के प्रयास
गौरैया के संरक्षण के लिए कई संगठन, सरकारें और पर्यावरण प्रेमी काम कर रहे हैं। कुछ प्रमुख प्रयास निम्नलिखित हैं:
(क) विश्व गौरैया दिवस (World Sparrow Day)
हर साल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को गौरैया संरक्षण के लिए जागरूक करना है।
(ख) नेस्ट बॉक्स (कृत्रिम घोंसले)
घर की खिड़कियों, छतों और बालकनी में कृत्रिम घोंसले लगाने से गौरैया को आश्रय मिल सकता है।
(ग) दाना-पानी का प्रबंध
रोज़ाना बालकनी, आँगन या छत पर पानी और दाना रखने से गौरैया दोबारा आकर्षित हो सकती है।
(घ) कीटनाशकों का कम उपयोग
पर्यावरण-अनुकूल कृषि अपनाने से गौरैया के भोजन के स्रोत बचाए जा सकते हैं।
(ङ) पेड़ और झाड़ियाँ लगाना
स्थानीय पेड़-पौधे और झाड़ियाँ गौरैया के लिए सुरक्षा और भोजन उपलब्ध कराती हैं।
8. घर में गौरैया कैसे वापस लाएँ? (व्यावहारिक सुझाव)
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नेस्ट बॉक्स लगाएँ – लकड़ी का छोटा-सा घोंसला घर की दीवार या बालकनी में टांगें।
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दाना रखें – बाजरा, चावल, गेहूं, ज्वार आदि खुले स्थान पर रखें।
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स्वच्छ पानी का कटोरा – खासकर गर्मियों में अत्यंत महत्वपूर्ण।
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रासायनिक स्प्रे कम करें – घरों के आस-पास कीटनाशक कम से कम प्रयोग करें।
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शांत और सुरक्षित वातावरण – ऐसी जगहें चुनें जहां बिल्ली या शोर न हो।
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स्थानीय पौधे लगाएँ – पौधों की शाखाएँ गौरैया को आश्रय देती हैं।
9. गौरैया और पर्यावरणीय चेतना
गौरैया की घटती संख्या हमारे पारिस्थितिक तंत्र में आए असंतुलन का संकेत है। यह छोटा-सा पक्षी हमें बताता है कि शहरीकरण के नाम पर हम प्रकृति से लगातार दूर होते जा रहे हैं। यदि गौरैया जैसे आम पक्षी भी गायब होने लगें, तो यह पर्यावरण के लिए गंभीर खतरे का संकेत है।
गौरैया का संरक्षण केवल एक पक्षी को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण और जैव-विविधता को सुरक्षित रखने का संकल्प है।
10. निष्कर्ष
गौरैया हमारे जीवन, संस्कृति और पर्यावरण का अभिन्न हिस्सा रही है। इसकी मधुर चहचहाहट ने हमेशा हमारे घरों और आँगनों को जीवंत बनाया है। लेकिन तेजी से बदलते परिवेश और मानव गतिविधियों के कारण यह नन्ही चिड़िया संकट में है। यदि हम अभी भी सचेत नहीं हुए तो गौरैया केवल किताबों में पढ़ी जाने वाली प्रजाति बन सकती है।
इसलिए आवश्यक है कि हम अपने घरों में दाना-पानी रखें, घोंसले बनाएँ, पेड़-पौधों को बढ़ावा दें और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली अपनाएँ। यदि हम छोटे-छोटे कदम उठाएँ, तो यह प्यारी चिड़िया हमारे घरों में फिर से लौट सकती है और हमारा वातावरण पुनः अपना पुराना संगीत वापस पा सकता है।
