भारत के वनों, पहाड़ों और ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाई देने वाला लंगूर हमारे प्राकृतिक परिवेश का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। अपनी लंबी पूंछ, चंचल स्वभाव और विशिष्ट चेहरे वाले लंगूर सदियों से भारतीय संस्कृति, धर्म और पर्यावरण से जुड़े रहे हैं। इन्हें न केवल वन्यजीवन में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है, बल्कि सामाजिक और धार्मिक मान्यताओं में भी इनकी उपस्थित बहुत खास है।
इस लेख में हम लंगूर की प्रजातियाँ, बनावट, व्यवहार, भोजन, निवास-स्थान, सामाजिक जीवन, मानव से संबंध तथा संरक्षण जैसे विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
1. लंगूर का परिचय
लंगूर, जिन्हें सामान्य रूप से हनुमान लंगूर या ग्रे लैंगूर कहा जाता है, बंदर प्रजाति का एक समूह है। वैज्ञानिक वर्गीकरण में इनका नाम सेमनोपिथेकस (Semnopithecus) है। भारत, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और बांग्लादेश सहित दक्षिण एशिया में इनकी कई प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
भारत में इन्हें विशेष आदर मिलता है, क्योंकि इनका संबंध भगवान हनुमान से जोड़ा जाता है। कई स्थानों पर लोग लंगूरों को भोजन देते हैं और इन्हें शुभ माना जाता है।
2. शारीरिक संरचना
लंगूर अपनी खास और अनोखी बनावट के लिए जाने जाते हैं।
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रंग: इनका शरीर सामान्यतः धूसर (ग्रे) या हल्का भूरा होता है, जबकि चेहरा काला।
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पूंछ: लंगूर की पूंछ बहुत लंबी और मुड़ी हुई होती है, जो कभी-कभी उसके पूरे शरीर से भी लंबी होती है।
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ऊँचाई व वजन: वयस्क लंगूर 60 से 80 सेंटीमीटर तक लंबे होते हैं, और वजन 10 से 20 किलोग्राम के आसपास होता है।
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चेहरा व आँखें: काले चेहरे और बड़ी आंखों के कारण उनका चेहरा बेहद आकर्षक लगता है।
3. लंगूर की प्रमुख प्रजातियाँ
भारत में पाई जाने वाली लंगूर की मुख्य प्रजातियाँ हैं:
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नॉर्दर्न प्लेन्स ग्रे लैंगूर
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सदर्न प्लेन्स लंगूर
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हिमालयन ग्रे लंगूर
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ताराई ग्रे लंगूर
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ब्लैक-फेस्ड लंगूर (हनुमान लंगूर)
इन प्रजातियों में शरीर की बनावट, रंग, आकार और निवास-स्थान के अनुसार कुछ अंतर देखने को मिलते हैं।
4. आवास और वितरण
लंगूर अत्यंत अनुकूलनशील जीव हैं, जो अनेक प्रकार के पर्यावरण में जीवित रह सकते हैं।
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समतल वन
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पहाड़ी क्षेत्र
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सूखे पर्णपाती वन
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घने जंगल
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मानव बस्तियों का आसपास का क्षेत्र
इनकी आबादी भारत के लगभग हर राज्य में मिलती है। शहरों और कस्बों में भी ये प्रायः दिखाई देते हैं।
5. भोजन और पोषण
लंगूर मुख्यतः शाकाहारी होते हैं। उनके भोजन में शामिल है:
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हरी पत्तियाँ
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फल
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फूल
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कोमल टहनियाँ
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बीज
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अनाज (मानव बस्तियों में आसानी से मिल जाने के कारण)
लंगूरों का पेट विशेष रूप से इस तरह विकसित होता है कि वे कठोर पत्तियों और फाइबर युक्त भोजन को आसानी से पचा लेते हैं। इन्हें "लीफ-ईटर" यानी पत्ते खाने वाला बंदर भी कहा जाता है।
6. सामाजिक जीवन और व्यवहार
लंगूर सामाजिक जीव हैं और समूह में रहना पसंद करते हैं। एक समूह में आमतौर पर 10 से 40 सदस्य हो सकते हैं।
समूह का ढांचा:
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एक प्रमुख नर
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कई मादाएँ
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उनके बच्चे
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कभी-कभी कुछ युवा नर
व्यवहार:
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लंगूर अत्यंत सतर्क होते हैं।
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उनकी आवाज़ तेज़ और प्रभावशाली होती है।
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खतरा महसूस होने पर वे जोर से चिल्लाकर समूह को सतर्क करते हैं।
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बच्चों की देखभाल में मादाएँ एक-दूसरे की मदद करती हैं।
7. बुद्धिमत्ता और संचार
लंगूर बहुत बुद्धिमान जीव हैं।
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ये अनेक प्रकार की आवाजों और हाव-भाव से संचार कर सकते हैं।
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भोजन खोजने में बहुत चतुर होते हैं।
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पानी और भोजन की उपलब्धता का सही अनुमान लगा लेते हैं।
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मानवों के साथ घुल-मिलने की क्षमता भी इनमें अधिक होती है।
8. लंगूर और मानव का संबंध
भारत में लंगूरों को धार्मिक दृष्टि से अत्यंत सम्मान दिया जाता है।
धार्मिक महत्व:
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इन्हें भगवान हनुमान के स्वरूप के रूप में देखा जाता है।
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कई मंदिरों में लोग इन्हें प्रसाद देते हैं।
मानव से सह-अस्तित्व:
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गांवों और शहरों में लंगूर अक्सर घरों के पास देखे जाते हैं।
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कई जगह लोग इन्हें हानि न पहुँचाने का प्रयास करते हैं।
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कुछ स्थानों पर ये फसलों को नुकसान भी पहुंचाते हैं।
9. पर्यावरण में भूमिका
लंगूर पर्यावरण में कई प्रकार से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं:
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वे फल खाकर बीज फैलाते हैं, जिससे नए पौधों का विकास होता है।
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जंगलों में पौधों की विविधता बनाए रखने में मदद करते हैं।
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कई शिकारी जीवों के लिए वे भोजन का स्रोत भी हैं, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बना रहता है।
10. चुनौतियाँ और खतरे
लंगूरों को आज कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है:
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वनों की कटाई
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शहरीकरण और habitat loss
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सड़क दुर्घटनाएँ
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मानव-वन्यजीव संघर्ष
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भोजन के लिए मानव पर निर्भरता
इन कारणों से कई क्षेत्रों में लंगूरों की संख्या घट रही है।
11. संरक्षण प्रयास
भारत सरकार और कई पर्यावरण संगठन लंगूरों के संरक्षण के लिए विभिन्न कार्यक्रम चला रहे हैं:
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संरक्षित वन क्षेत्र का विस्तार
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जागरूकता कार्यक्रम
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सड़क किनारे चेतावनी संकेत
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वन्यजीव बचाव टीमें
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मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के उपाय
जनभागीदारी के बिना संरक्षण सफल नहीं हो सकता, इसलिए लोगों को भी वन्यजीवों के प्रति संवेदनशील होना आवश्यक है।
12. निष्कर्ष
लंगूर न केवल भारतीय जंगलों की शोभा बढ़ाते हैं, बल्कि हमारी संस्कृति और परंपराओं से भी गहराई से जुड़े हैं। बुद्धिमान, चंचल और सामाजिक स्वभाव वाले ये प्राणी पारिस्थितिकी को संतुलित रखने में अपरिहार्य भूमिका निभाते हैं।
उनकी सुरक्षा और संरक्षण हमारी नैतिक जिम्मेदारी है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इन अद्भुत जीवों को प्रकृति में स्वतंत्र रूप से विचरण करते देख सकें।
by - kajal verma
