चुड़ैल: लोककथाओं, समाज और मनोविज्ञान का एक रहस्यमय रूप ( By- Payal Bharti )

 भूमिका

भारतीय लोककथाओं, ग्रामीण विश्वासों और जनमानस में “चुड़ैल” का नाम आते ही भय, रहस्य और अंधविश्वास की छाया फैल जाती है। चुड़ैल को अक्सर एक भयानक, अलौकिक और खतरनाक स्त्री के रूप में चित्रित किया जाता है, जो रात में निकलती है, लोगों को नुकसान पहुँचाती है और मासूमों की जान ले लेती है। लेकिन क्या चुड़ैल वास्तव में कोई अलौकिक शक्ति है, या यह समाज द्वारा गढ़ी गई एक ऐसी छवि है, जो डर, अज्ञान और पितृसत्तात्मक सोच से जन्मी है?
यह लेख चुड़ैल की अवधारणा को लोककथाओं, इतिहास, सामाजिक दृष्टिकोण, मनोवैज्ञानिक कारणों और आधुनिक समय में इसके प्रभाव के संदर्भ में समझने का प्रयास करता है।


चुड़ैल की परिभाषा

सामान्य रूप से चुड़ैल उस स्त्री को कहा जाता है, जिसके बारे में यह माना जाता है कि उसमें जादुई या अलौकिक शक्तियाँ होती हैं और वह इन शक्तियों का उपयोग दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए करती है। भारतीय लोकविश्वासों में चुड़ैल को अक्सर ऐसी औरत माना गया है जो मरने के बाद भटकती आत्मा बन जाती है, या जो जीवित रहते हुए भी तंत्र-मंत्र, काला जादू और टोने-टोटके जानती है।

भारतीय लोककथाओं में चुड़ैल

भारत के अलग-अलग हिस्सों में चुड़ैल के लिए अलग-अलग नाम प्रचलित हैं। कहीं उसे डायन, कहीं चुड़ैल, कहीं डाकिनी और कहीं पिशाचिनी कहा जाता है।

ग्रामीण लोककथाओं में चुड़ैल को प्रायः इस प्रकार दर्शाया जाता है:

  • उसके पैर उल्टे होते हैं

  • वह रात के समय दिखाई देती है

  • वह सुनसान रास्तों या पीपल के पेड़ों के पास रहती है

  • वह पुरुषों को आकर्षित कर उन्हें बीमार या मृत कर देती है

इन कहानियों का उद्देश्य अक्सर बच्चों और युवाओं को रात में बाहर न निकलने की चेतावनी देना होता था, लेकिन समय के साथ ये कथाएँ भय और अंधविश्वास का रूप लेती चली गईं।

इतिहास में चुड़ैल की अवधारणा

चुड़ैल की धारणा केवल भारत तक सीमित नहीं है। यूरोप, अफ्रीका और एशिया के कई हिस्सों में सदियों तक चुड़ैल-शिकार (Witch Hunt) होता रहा। मध्यकालीन यूरोप में हजारों महिलाओं को चुड़ैल बताकर जिंदा जला दिया गया।

भारत में भी इतिहास के विभिन्न दौरों में महिलाओं को चुड़ैल बताकर समाज से बहिष्कृत किया गया, उनकी पिटाई की गई या उन्हें मार दिया गया। अधिकतर मामलों में ये महिलाएँ:

  • विधवा होती थीं

  • गरीब होती थीं

  • समाज के नियमों को न मानने वाली या स्वतंत्र विचारों वाली होती थीं

इससे स्पष्ट होता है कि चुड़ैल की अवधारणा का इस्तेमाल अक्सर महिलाओं को दबाने के लिए किया गया।

समाज और चुड़ैल: अंधविश्वास की जड़ें

ग्रामीण समाजों में आज भी बीमारी, फसल खराब होने, बच्चे की मृत्यु या प्राकृतिक आपदाओं के लिए किसी “चुड़ैल” को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। जब विज्ञान और शिक्षा की कमी होती है, तब लोग किसी न किसी को दोषी ठहराकर अपने डर को शांत करना चाहते हैं।

अंधविश्वास की मुख्य वजहें:

  • अशिक्षा

  • गरीबी

  • स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी

  • सामाजिक असमानता

अक्सर किसी एक कमजोर महिला को निशाना बनाकर पूरे समाज की कुंठा उस पर उतार दी जाती है।

चुड़ैल और पितृसत्ता

चुड़ैल की छवि गहराई से पितृसत्तात्मक सोच से जुड़ी हुई है। समाज में जो महिला सुंदर नहीं, आज्ञाकारी नहीं, या परंपरागत भूमिका में फिट नहीं बैठती, उसे शक की निगाह से देखा जाता है।

स्वतंत्र विचारों वाली, अकेली रहने वाली या पुरुषों के नियंत्रण से बाहर रहने वाली महिलाओं को “खतरनाक” मान लिया जाता है। धीरे-धीरे यही डर चुड़ैल की कहानी में बदल जाता है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण

मनोविज्ञान के अनुसार, चुड़ैल जैसी अवधारणाएँ सामूहिक भय (Collective Fear) का परिणाम होती हैं। जब लोग किसी अनजानी घटना का तार्किक कारण नहीं ढूंढ पाते, तो वे अलौकिक व्याख्या गढ़ लेते हैं।

इसके अलावा:

  • भ्रम (Hallucination)

  • मानसिक बीमारियाँ

  • तनाव और अवसाद

भी कभी-कभी ऐसे अनुभव पैदा कर सकते हैं, जिन्हें लोग भूत-प्रेत या चुड़ैल से जोड़ देते हैं।

साहित्य और सिनेमा में चुड़ैल

हिंदी साहित्य और फिल्मों में चुड़ैल को अक्सर डरावने रूप में दिखाया गया है। पुरानी फिल्मों में सफेद साड़ी, खुले बाल और विकृत चेहरा चुड़ैल की पहचान बन गई।

हालाँकि आधुनिक साहित्य और सिनेमा में चुड़ैल की छवि बदल रही है। अब उसे एक शोषित महिला, बदले की भावना से भरी आत्मा या सामाजिक अन्याय की प्रतीक के रूप में दिखाया जाने लगा है।

कानून और सामाजिक सुधार

भारत के कई राज्यों में डायन प्रथा निषेध कानून बनाए गए हैं। इन कानूनों का उद्देश्य चुड़ैल बताकर महिलाओं पर होने वाले अत्याचार को रोकना है।

इसके बावजूद:

  • कानून की जानकारी का अभाव

  • सामाजिक दबाव

  • पुलिस और प्रशासन की उदासीनता

जैसे कारणों से यह प्रथा पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई है।

शिक्षा और जागरूकता की भूमिका

चुड़ैल जैसी कुप्रथाओं को समाप्त करने के लिए शिक्षा सबसे बड़ा हथियार है। जब लोग वैज्ञानिक सोच अपनाते हैं, तब वे बीमारी और प्राकृतिक घटनाओं को तर्क के आधार पर समझने लगते हैं।

साथ ही:

  • महिला सशक्तिकरण

  • स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार

  • सामाजिक संवाद

इन सबकी भी अहम भूमिका है।

आधुनिक समय में चुड़ैल की नई व्याख्या

आज चुड़ैल को केवल एक डरावनी आत्मा के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रतीक के रूप में देखा जाने लगा है। कुछ विचारकों के अनुसार चुड़ैल उस स्त्री का प्रतीक है, जो समाज के बनाए नियमों को चुनौती देती है।

इस संदर्भ में चुड़ैल:

  • विद्रोह की प्रतीक बन जाती है

  • स्वतंत्रता की आवाज़ बन जाती है

  • दबे-कुचले वर्ग की पहचान बन जाती है

निष्कर्ष

चुड़ैल कोई वास्तविक अलौकिक प्राणी नहीं, बल्कि समाज के डर, अज्ञान और असमानता की उपज है। सदियों से इस अवधारणा का इस्तेमाल महिलाओं को नियंत्रित करने और शोषित करने के लिए किया गया है।

आज आवश्यकता है कि हम चुड़ैल को डर की नहीं, बल्कि समझ की दृष्टि से देखें। जब तक समाज में शिक्षा, समानता और वैज्ञानिक सोच नहीं बढ़ेगी, तब तक चुड़ैल जैसी धारणाएँ किसी न किसी रूप में बनी रहेंगी।

चुड़ैल की कहानी हमें यह सिखाती है कि असली खतरा किसी अलौकिक शक्ति से नहीं, बल्कि हमारे अपने अंधविश्वास और अन्यायपूर्ण सोच से है।

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