दो रास्ते, एक दोस्ती { दोस्ती पर दिल छू जाने वाली कहानी } ( By Aparna Gupta )

 

दो रास्ते, एक दोस्ती

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव भद्रापुर में एक ही दिन दो बच्चों का जन्म हुआ था। गाँव वालों ने हँसते हुए कहा था, “इन दोनों की दोस्ती ऊपर से लिखी हुई है।” उन दोनों का नाम था अमन और राघव

बचपन से ही दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे थे। स्कूल जाना हो, खेतों में दौड़ लगानी हो, नदी में तैरना हो या आम के पेड़ पर चढ़कर कच्चे आम तोड़ना — हर जगह दोनों साथ होते। अगर अमन को मास्टर जी से डाँट पड़ती, तो राघव का चेहरा भी उतर जाता। और अगर राघव हँसता, तो अमन की हँसी अपने आप खिल उठती।



बचपन के सपने

रात को दोनों अपने-अपने घरों की छत पर लेटकर तारों को देखते और भविष्य के सपने बुनते।

राघव कहता, “मैं बड़ा होकर इंजीनियर बनूँगा और शहर में बड़ा नाम कमाऊँगा।”

अमन मुस्कुराकर जवाब देता, “और मैं मास्टर बनूँगा, ताकि हमारे गाँव के बच्चे भी बड़े सपने देख सकें।”

राघव मज़ाक में कहता, “जब मैं शहर से लौटूँगा ना, तो तेरे लिए बहुत महंगा तोहफा लाऊँगा।”

अमन हल्के से कहता, “मुझे तोहफा नहीं चाहिए, बस तू मुझे भूल मत जाना।”

तब उन्हें कहाँ पता था कि ज़िंदगी उनके इम्तिहान लेने वाली है।

ज़िंदगी का पहला मोड़

बारहवीं के बाद राघव का दाखिला दिल्ली के एक बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज में हो गया। पूरे गाँव में खुशी की लहर दौड़ गई। अमन भी खुश था, लेकिन उसके दिल में एक अजीब सी खालीपन की टीस थी।

बस स्टैंड पर जब राघव जा रहा था, दोनों की आँखें नम थीं।

“रो मत पगले,” राघव ने कहा, “फोन है ना, रोज़ बात करेंगे।”

अमन ने बस इतना कहा, “अपने आप को बदल मत देना।”

बस चल पड़ी। धूल उड़ी। और अमन को लगा जैसे उसका बचपन भी उसी बस में बैठकर दूर चला गया।

शहर की दुनिया

शुरुआत में राघव रोज़ फोन करता था। वह अपने नए दोस्तों, कॉलेज और शहर की बातें करता। अमन बड़े ध्यान से सब सुनता।

लेकिन धीरे-धीरे फोन कम हो गए। फिर हफ्ते में एक बार। फिर महीने में एक बार।

एक दिन अमन ने खुद फोन किया।

“यार, अभी बहुत व्यस्त हूँ, बाद में बात करता हूँ,” राघव ने जल्दी में कहा।

वह “बाद में” कभी नहीं आया।

अमन हर शाम गाँव के उसी पुराने पेड़ के नीचे बैठता, जहाँ वे दोनों बचपन में बैठते थे। हाथ में फोन होता, लेकिन घंटी नहीं बजती।

दूरियाँ

समय बीतता गया। राघव ने पढ़ाई पूरी की और एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई। उसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर चमक रही थीं — बड़े दफ्तर, नई कार, नए दोस्त।

अमन ने बी.एड. किया और गाँव के स्कूल में शिक्षक बन गया। उसने अपना सपना पूरा किया, लेकिन उसके दिल में दोस्ती की कमी हमेशा चुभती रही।

एक दिन गाँव में खबर आई कि राघव की शादी तय हो गई है। यह खबर भी अमन को किसी और से मिली, राघव से नहीं।

उस रात अमन बहुत देर तक जागता रहा। उसकी आँखों में आँसू थे, पर दिल में कोई शिकायत नहीं — सिर्फ दर्द।


एक हादसा

शादी के कुछ महीनों बाद अचानक खबर आई कि राघव का एक्सीडेंट हो गया है। उसकी कार एक ट्रक से टकरा गई थी। हालत गंभीर थी।

यह सुनते ही अमन बिना एक पल गंवाए दिल्ली के लिए निकल पड़ा।

अस्पताल के बाहर खड़े होकर उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। आईसीयू के बाहर राघव के माता-पिता और पत्नी रो रहे थे।

अमन चुपचाप खड़ा रहा। फिर उसने धीरे से कहा, “वह अकेला नहीं है… मैं आ गया हूँ।”

होश की पहली झलक

दो दिन बाद राघव को होश आया। उसने आँखें खोलीं और सामने अमन को देखा।

“अमन… तू?” उसकी आवाज़ धीमी थी।

अमन की आँखें भर आईं। “हाँ, मैं। दोस्ती इतनी सस्ती नहीं होती कि थोड़ी दूरी से टूट जाए।”

राघव की आँखों से आँसू बहने लगे। “मैं बदल गया था… मैंने तुझे नजरअंदाज किया। मुझे लगा शहर की जिंदगी ही सब कुछ है।”

अमन ने उसका हाथ थाम लिया। “गलती इंसान से होती है, लेकिन सच्ची दोस्ती माफ करना जानती है।”

उस पल दोनों के बीच की सारी दूरियाँ मिट गईं।

एहसास

अस्पताल के दिनों में राघव को समझ आया कि दौलत, शोहरत और बड़े लोग सब अपनी जगह हैं, लेकिन जो दोस्त बिना शिकायत के आपके साथ खड़ा रहे — वही असली दौलत है।

एक रात राघव ने कहा, “अमन, मैं इस भागदौड़ से थक गया हूँ। क्या मैं वापस गाँव आ सकता हूँ?”

अमन मुस्कुराया, “हमारा पेड़ अब भी वहीं खड़ा है। और तेरे लिए जगह भी खाली है।”


नई शुरुआत

कुछ महीनों बाद राघव ने नौकरी छोड़ दी और गाँव लौट आया। लोगों को आश्चर्य हुआ, लेकिन उसने अपना फैसला कर लिया था।

दोनों ने मिलकर गाँव में एक कोचिंग सेंटर खोला। राघव विज्ञान और गणित पढ़ाता, अमन बाकी विषय। धीरे-धीरे उनके पढ़ाए बच्चे बड़े शहरों के कॉलेजों में जाने लगे।

एक शाम दोनों फिर उसी पेड़ के नीचे बैठे थे।

राघव ने हँसते हुए कहा, “याद है, मैंने कहा था कि तेरे लिए तोहफा लाऊँगा?”

अमन मुस्कुराया, “हाँ, पर सबसे बड़ा तोहफा तो तू खुद है।”

सूरज ढल रहा था, लेकिन उनकी दोस्ती का सूरज फिर से चमक उठा था।

संदेश

समय और दूरी रिश्तों की परीक्षा लेते हैं, लेकिन सच्ची दोस्ती हर परीक्षा में पास हो जाती है। दोस्ती रोज़-रोज़ बात करने का नाम नहीं है, बल्कि दिल से जुड़े रहने का नाम है।

अमन और राघव की कहानी गाँव में मिसाल बन गई। लोग कहते थे —

“सच्चा दोस्त वही है,
जो वक्त बदलने पर भी
आपका साथ न छोड़े।”

और सच भी यही है —
रास्ते चाहे अलग हो जाएँ,
अगर दिल सच्चे हों,
तो मंज़िल फिर एक हो जाती है।

गाँव में राघव के लौट आने के बाद जैसे एक नई हवा बहने लगी थी। लोग हैरान भी थे और खुश भी। कोई कहता, “इतनी बड़ी नौकरी छोड़कर कौन आता है?” तो कोई कहता, “सच्ची जड़ें मिट्टी से ही जुड़ी होती हैं।”

लेकिन सच्चाई यह थी कि राघव के मन में अभी भी एक हल्का-सा डर था — क्या वह सच में शहर की चमक छोड़कर गाँव की सादगी में ढल पाएगा?

नई शुरुआत की चुनौतियाँ

कोचिंग सेंटर शुरू तो हो गया था, लेकिन शुरुआत आसान नहीं थी। गाँव के लोग पहले संकोच में थे। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि उनके बच्चे भी बड़े कॉलेजों में जा सकते हैं।

एक दिन एक किसान अपने बेटे को लेकर आया।

“मास्टर जी,” उसने अमन से कहा, “हम गरीब लोग हैं। हमारा बेटा क्या इंजीनियर बन सकता है?”

राघव ने मुस्कुराकर उस बच्चे के कंधे पर हाथ रखा, “क्यों नहीं? दिमाग अमीर-गरीब देखकर नहीं चलता।”

धीरे-धीरे बच्चे आने लगे। सुबह स्कूल, शाम को कोचिंग। अमन अनुशासन सिखाता, राघव सपने दिखाता।

लेकिन जिंदगी सीधी रेखा नहीं होती।

एक गलतफहमी

कुछ महीनों बाद गाँव में एक अफवाह फैल गई। किसी ने कहा कि राघव को शहर से वापस बुलावा आया है — बड़ी सैलरी के साथ।

अमन ने यह बात सुनी, लेकिन उसने राघव से कुछ नहीं पूछा। उसके मन में हल्की-सी चुभन हुई। “अगर वह चला गया तो?” यह डर उसे बेचैन करने लगा।

उधर सच यह था कि कंपनी ने सच में राघव को दोबारा ऑफर दिया था। बहुत बड़ी रकम थी। राघव उलझन में था। एक तरफ गाँव और अमन, दूसरी तरफ सुरक्षित भविष्य और पैसा।

एक रात राघव अकेले उसी पुराने पेड़ के नीचे बैठा था। अमन वहाँ पहुँचा।

“कुछ परेशान लग रहा है?” अमन ने पूछा।

राघव ने बात टाल दी, “नहीं, बस ऐसे ही।”

दोनों के बीच पहली बार एक खामोशी आई — ऐसी खामोशी जिसमें अनकहे सवाल थे।

त्याग की परिभाषा

दो दिन बाद राघव ने अमन को सब सच बता दिया।

“मुझे ऑफर आया है… बहुत बड़ा। अगर मैं चला जाऊँ तो… हमारे सेंटर का क्या होगा?”

अमन कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “अगर तू जाना चाहता है, तो जा। मैं संभाल लूँगा।”

राघव ने उसकी आँखों में देखा। वहाँ दर्द था, लेकिन स्वार्थ नहीं।

“और हमारी दोस्ती?” राघव ने धीमे से पूछा।

अमन मुस्कुराया, “दोस्ती नौकरी से नहीं चलती।”

उस रात राघव सो नहीं पाया। उसे अस्पताल वाला दिन याद आया। उसे अमन की आँखों का भरोसा याद आया। उसने तय कर लिया।

अगली सुबह उसने कंपनी को मना कर दिया।

“मैंने अपना भविष्य चुन लिया है,” उसने अमन से कहा।

अमन ने पूछा, “कहाँ?”

राघव ने हँसकर कहा, “यहीं… तेरे साथ।”



बड़ा इम्तिहान

समय बीतता गया। कोचिंग सेंटर ने नाम कमाना शुरू कर दिया। एक दिन खबर आई कि उनके सेंटर का एक छात्र, इरफान, ने IIT की परीक्षा पास कर ली है।

पूरा गाँव जश्न मनाने लगा। लोग मिठाई लेकर आने लगे।

लेकिन उसी खुशी के बीच अमन अचानक बेहोश हो गया।

जाँच में पता चला कि उसे गंभीर किडनी की बीमारी है। इलाज महंगा था। शहर में ऑपरेशन करना जरूरी था।

राघव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

“तू चिंता मत कर,” अमन ने अस्पताल के बिस्तर से कहा, “मैं ठीक हो जाऊँगा।”

पर डॉक्टर ने साफ कहा, “इलाज में बहुत खर्च आएगा।”

राघव के पास कुछ बचत थी, लेकिन पर्याप्त नहीं। उसने बिना किसी को बताए अपनी बची हुई जमीन बेच दी। यहाँ तक कि उसने अपनी पत्नी के गहने भी गिरवी रख दिए।

जब अमन को यह बात पता चली, तो उसकी आँखें भर आईं।

“तू पागल है क्या?” अमन ने कहा।

राघव ने जवाब दिया, “जब तू अस्पताल में मेरे लिए खड़ा था, तब मैंने कसम खाई थी — अब तेरे लिए कभी पीछे नहीं हटूँगा।”

ऑपरेशन का दिन

ऑपरेशन थिएटर के बाहर राघव बैठा था। उसकी आँखें बंद थीं, हाथ जुड़े हुए।

उसे बचपन का हर पल याद आ रहा था — खेतों में दौड़ना, नदी में कूदना, छत पर सपने देखना।

घंटों बाद डॉक्टर बाहर आए।

“ऑपरेशन सफल रहा।”

राघव की आँखों से आँसू बह निकले। उसने आसमान की ओर देखा और मन ही मन कहा, “धन्यवाद।”

दोस्ती का असली अर्थ

कुछ महीनों बाद अमन पूरी तरह ठीक हो गया। गाँव में फिर से रौनक लौट आई।

एक दिन दोनों फिर उसी पेड़ के नीचे बैठे थे।

अमन ने कहा, “राघव, अगर तू शहर चला जाता तो शायद आज मैं…”

राघव ने बीच में ही रोक दिया, “अगर तू उस दिन अस्पताल नहीं आता, तो शायद मैं आज जिंदा भी नहीं होता। हिसाब बराबर है।”

दोनों हँस पड़े।

अंतिम दृश्य

सालों बाद उनका कोचिंग सेंटर एक बड़ा शिक्षण संस्थान बन चुका था। दूर-दूर से बच्चे पढ़ने आते।

एक कार्यक्रम में मंच पर अमन और राघव साथ खड़े थे। उनके पढ़ाए सैकड़ों छात्र सामने बैठे थे।

अमन ने माइक पर कहा,
“हमने अपने जीवन में बहुत कुछ खोया और पाया। लेकिन एक चीज़ कभी नहीं खोई — विश्वास।”

राघव ने आगे कहा,
“दोस्ती वह नहीं जो केवल अच्छे समय में साथ दे। दोस्ती वह है जो बुरे समय में आपकी ताकत बन जाए।”

भीड़ तालियों से गूंज उठी।

सूरज ढल रहा था। वही पुराना पेड़ अब भी खड़ा था — गवाह था दो दोस्तों की कहानी का।

और उस पेड़ की छाँव में आज भी लोग कहते हैं —

“अगर दोस्त सच्चा हो,
तो जिंदगी की हर मुश्किल छोटी हो जाती है।
दो रास्ते चाहे अलग हों,
पर दिल अगर एक हों,
तो मंजिल खुद रास्ता ढूंढ लेती है।”


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