रोलेट एक्ट भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विवादास्पद कानून था। इसे 1919 में ब्रिटिश सरकार द्वारा पारित किया गया था। इस कानून का आधिकारिक नाम Anarchical and Revolutionary Crimes Act, 1919 था, लेकिन इसे आम तौर पर "रोलेट एक्ट" कहा गया क्योंकि यह कानून ब्रिटिश न्यायाधीश सर सिडनी रोलेट की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों के आधार पर बनाया गया था।
यह अधिनियम भारतीय जनता की स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों के विरुद्ध था, इसलिए इसे भारतीयों ने “काला कानून” कहा। इस कानून के विरुद्ध पूरे देश में व्यापक विरोध हुआ और इसी के परिणामस्वरूप भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन ने एक नया मोड़ लिया।
रोलेट एक्ट की पृष्ठभूमि
1914 से 1918 तक प्रथम विश्व युद्ध चला। इस युद्ध में भारत ने ब्रिटेन का साथ दिया। लाखों भारतीय सैनिकों ने युद्ध में भाग लिया और देश की जनता ने भी आर्थिक सहायता दी। भारतीयों को उम्मीद थी कि युद्ध के बाद अंग्रेज सरकार उन्हें राजनीतिक अधिकार और स्वशासन (Self-Government) देगी।
लेकिन इसके विपरीत, ब्रिटिश सरकार को यह भय था कि भारत में क्रांतिकारी गतिविधियाँ बढ़ रही हैं। बंगाल, पंजाब और अन्य क्षेत्रों में क्रांतिकारी संगठन सक्रिय थे। इसी कारण 1918 में एक समिति बनाई गई जिसकी अध्यक्षता सर सिडनी रोलेट ने की। इस समिति ने सुझाव दिया कि सरकार को असाधारण शक्तियाँ दी जाएँ ताकि क्रांतिकारी गतिविधियों को दबाया जा सके।
इन सिफारिशों के आधार पर 1919 में रोलेट एक्ट पारित किया गया।
रोलेट एक्ट के प्रमुख प्रावधान
रोलेट एक्ट के तहत सरकार को निम्नलिखित विशेष अधिकार दिए गए:
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बिना मुकदमे के गिरफ्तारी – किसी भी व्यक्ति को संदेह के आधार पर गिरफ्तार किया जा सकता था।
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बिना जूरी के मुकदमा – आरोपी को जूरी (जन-सदस्य) की सहायता के बिना ही न्यायालय में पेश किया जाता था।
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अपील का अधिकार नहीं – अभियुक्त को उच्च न्यायालय में अपील करने का अधिकार नहीं था।
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बिना वारंट तलाशी – पुलिस किसी भी व्यक्ति या स्थान की तलाशी ले सकती थी।
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प्रेस पर नियंत्रण – समाचार पत्रों और प्रकाशनों पर सख्त नियंत्रण रखा गया।
इन प्रावधानों से स्पष्ट था कि यह कानून भारतीयों की नागरिक स्वतंत्रता को समाप्त करने वाला था।
भारतीयों की प्रतिक्रिया
रोलेट एक्ट के पारित होते ही पूरे देश में आक्रोश फैल गया। भारतीय नेताओं ने इसे अन्यायपूर्ण और दमनकारी बताया।
महात्मा गांधी का विरोध
Mahatma Gandhi ने इस कानून के विरोध में सत्याग्रह की घोषणा की। उन्होंने 6 अप्रैल 1919 को देशव्यापी हड़ताल (हड़ताल/हर्ताल) का आह्वान किया। दुकानों, कार्यालयों और विद्यालयों को बंद रखा गया।
गांधीजी का मानना था कि यह कानून न्याय और स्वतंत्रता के सिद्धांतों के विरुद्ध है। उन्होंने इसे अहिंसात्मक तरीके से समाप्त करने का प्रयास किया।
जलियांवाला बाग हत्याकांड और रोलेट एक्ट
रोलेट एक्ट के विरोध में पंजाब में विशेष रूप से तीव्र आंदोलन हुआ। 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के Jallianwala Bagh में हजारों लोग शांतिपूर्ण सभा कर रहे थे।
तभी ब्रिटिश अधिकारी Reginald Dyer ने बिना चेतावनी दिए भीड़ पर गोलियाँ चलवा दीं। इस घटना में सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों घायल हुए।
यह हत्याकांड रोलेट एक्ट के विरोध से जुड़ा था और इसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। इसके बाद अंग्रेजी शासन के प्रति भारतीयों का विश्वास पूरी तरह समाप्त हो गया।
रोलेट एक्ट का प्रभाव
रोलेट एक्ट का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर गहरा प्रभाव पड़ा:
1. राष्ट्रीय एकता में वृद्धि
इस कानून के विरोध में हिंदू, मुस्लिम, सिख सभी समुदाय एक साथ आए। इससे राष्ट्रीय एकता मजबूत हुई।
2. गांधीजी का राष्ट्रीय नेता के रूप में उदय
रोलेट सत्याग्रह के कारण गांधीजी राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रमुख नेता बनकर उभरे।
3. असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि
रोलेट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड ने आगे चलकर 1920 के असहयोग आंदोलन की नींव रखी।
4. ब्रिटिश शासन के प्रति अविश्वास
भारतीयों को यह स्पष्ट हो गया कि ब्रिटिश सरकार सुधार के बजाय दमन की नीति अपना रही है।
रोलेट एक्ट को “काला कानून” क्यों कहा गया?
भारतीयों ने इसे “काला कानून” इसलिए कहा क्योंकि:
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यह न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध था।
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इसमें नागरिक स्वतंत्रता का हनन था।
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सरकार को अत्यधिक शक्तियाँ दी गई थीं।
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यह भारतीयों की आवाज को दबाने का प्रयास था।
इस कानून ने भारतीयों को यह एहसास दिलाया कि स्वतंत्रता प्राप्त किए बिना सम्मानजनक जीवन संभव नहीं है।
रोलेट एक्ट का अंत
भारतीयों के तीव्र विरोध और आंदोलनों के कारण यह कानून प्रभावी रूप से असफल हो गया। हालांकि इसे औपचारिक रूप से तुरंत समाप्त नहीं किया गया, लेकिन जनआंदोलन के कारण सरकार को अपनी नीतियों में परिवर्तन करना पड़ा।
यह अधिनियम ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीति का प्रतीक बन गया और अंततः भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को और अधिक प्रबल बना गया।
निष्कर्ष
रोलेट एक्ट भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह कानून ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीयों की स्वतंत्रता को दबाने के उद्देश्य से बनाया गया था। लेकिन इसका परिणाम उल्टा हुआ — इसने भारतीयों में स्वतंत्रता की भावना को और प्रबल कर दिया।
रोलेट एक्ट के विरोध ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। महात्मा गांधी के नेतृत्व में सत्याग्रह आंदोलन ने देशभर में जनजागरण फैलाया। जलियांवाला बाग हत्याकांड ने इस आंदोलन को और अधिक तीव्र बना दिया।
अंततः रोलेट एक्ट यह सिद्ध करता है कि अन्याय और दमन के बल पर शासन लंबे समय तक नहीं चल सकता। यह कानून भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक महत्वपूर्ण कड़ी है जिसने देश को स्वतंत्रता की ओर अग्रसर किया।