सम्राट अशोक का दरबार – एक भव्य और ऐतिहासिक दृश्य by priya gupta

 भारतीय इतिहास में सम्राट अशोक का नाम अत्यंत आदर और गौरव के साथ लिया जाता है। वे केवल एक शक्तिशाली शासक ही नहीं थे, बल्कि एक ऐसे सम्राट थे जिन्होंने युद्ध और हिंसा के मार्ग को त्यागकर शांति, करुणा और धर्म का पथ अपनाया। उनके शासनकाल में मौर्य साम्राज्य अपनी चरम सीमा पर पहुँचा। यदि हम उस समय के राजदरबार की कल्पना करें, तो हमारे सामने एक अत्यंत भव्य, अनुशासित और गौरवपूर्ण दृश्य उभरता है। यह केवल एक राजा का दरबार नहीं था, बल्कि एक विशाल साम्राज्य की शक्ति, संस्कृति और नीति का प्रतीक था।

दरबार का वातावरण और वास्तुकला

सम्राट अशोक का दरबार पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) में स्थित भव्य राजप्रासाद में लगता था। राजमहल की वास्तुकला अत्यंत अद्भुत थी। विशाल स्तंभ, चमकदार पॉलिश किए गए पत्थर, सुंदर नक्काशी और चौड़े आँगन इस प्रासाद की शोभा बढ़ाते थे। महल के मुख्य सभा कक्ष में ऊँची छतें थीं, जिन पर बारीक कलाकृतियाँ उकेरी गई थीं। दीवारों पर मौर्यकालीन कला के उत्कृष्ट उदाहरण दिखाई देते थे।

सभा कक्ष के बीचों-बीच एक ऊँचा और सुसज्जित सिंहासन रखा होता था। यह सिंहासन केवल शक्ति का प्रतीक नहीं था, बल्कि न्याय और धर्म का भी प्रतीक था। सिंहासन के पीछे अशोक स्तंभ की आकृति या शेरों का प्रतीक बना होता था, जो साम्राज्य की शक्ति और एकता को दर्शाता था।

सम्राट अशोक का व्यक्तित्व

दरबार में प्रवेश करते ही सबसे पहले दृष्टि सम्राट अशोक पर पड़ती थी। वे ऊँचे सिंहासन पर विराजमान होते थे। उनके चेहरे पर गंभीरता और करुणा दोनों के भाव दिखाई देते थे। वे राजसी वस्त्र धारण करते थे—रेशमी परिधान, सुनहरी किनारी, और सिर पर सुसज्जित मुकुट। उनके गले में मोतियों और रत्नों की माला होती थी, जो उनके साम्राज्य की समृद्धि का प्रतीक थी।

लेकिन अशोक की सबसे बड़ी विशेषता उनका शांत और सौम्य स्वभाव था। कलिंग युद्ध के बाद उनके व्यक्तित्व में गहरा परिवर्तन आ गया था। अब वे केवल विजेता नहीं, बल्कि प्रजा के हितैषी शासक बन चुके थे। उनके दरबार में कठोरता से अधिक न्याय और दया का महत्व था।

दरबार की व्यवस्था

अशोक का दरबार अत्यंत अनुशासित और व्यवस्थित होता था। सभा में विभिन्न पदों के अधिकारी उपस्थित रहते थे—प्रधान मंत्री, सेनापति, धर्म महामात्र, न्यायाधीश, राजदूत और प्रांतीय शासक। प्रत्येक व्यक्ति अपने स्थान पर खड़ा या बैठा रहता था।

सभा के आरंभ में शंखनाद होता था, जो सम्राट के आगमन की सूचना देता था। सभी दरबारी आदरपूर्वक खड़े हो जाते थे। सम्राट के बैठने के बाद ही सभा की कार्यवाही प्रारंभ होती थी।

दरबार में प्रजा की समस्याओं को सुना जाता था। दूर-दराज के क्षेत्रों से आए लोग अपनी शिकायतें और सुझाव प्रस्तुत करते थे। अशोक स्वयं ध्यानपूर्वक उनकी बातें सुनते थे और न्यायपूर्ण निर्णय देते थे। यही कारण था कि उनकी प्रजा उन्हें अत्यंत सम्मान देती थी।

प्रशासनिक चर्चा

दरबार केवल औपचारिकता का स्थान नहीं था, बल्कि यह साम्राज्य के प्रशासन का केंद्र था। यहाँ राज्य की नीतियाँ बनाई जाती थीं। कर व्यवस्था, सिंचाई, व्यापार, सड़क निर्माण, और सुरक्षा जैसे विषयों पर चर्चा होती थी।

अशोक ने अपने शासन में ‘धम्म’ की नीति को अपनाया था। दरबार में धर्म और नैतिकता से जुड़े विषयों पर भी विचार-विमर्श होता था। धर्म महामात्रों को निर्देश दिए जाते थे कि वे जनता में नैतिक मूल्यों का प्रचार करें।

विदेशी राजदूत भी दरबार में उपस्थित होते थे। वे अन्य राज्यों से संदेश और उपहार लेकर आते थे। इससे स्पष्ट होता है कि मौर्य साम्राज्य की प्रतिष्ठा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी थी।

कला और संस्कृति का संगम

अशोक के दरबार में केवल राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियाँ ही नहीं होती थीं, बल्कि यह कला और संस्कृति का भी केंद्र था। नृत्यांगनाएँ और संगीतज्ञ विशेष अवसरों पर अपनी कला का प्रदर्शन करते थे। कवि और विद्वान सम्राट की प्रशंसा में रचनाएँ प्रस्तुत करते थे।

दरबार में विभिन्न धर्मों और विचारधाराओं के लोग उपस्थित रहते थे। अशोक धार्मिक सहिष्णुता में विश्वास रखते थे। वे बौद्ध धर्म के अनुयायी थे, लेकिन अन्य धर्मों का भी सम्मान करते थे। उनके दरबार में बौद्ध भिक्षु, ब्राह्मण और जैन साधु भी सम्मानपूर्वक आमंत्रित किए जाते थे।

न्याय की परंपरा

अशोक के दरबार की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसकी न्याय व्यवस्था थी। यदि किसी व्यक्ति के साथ अन्याय होता, तो उसे सीधे दरबार में अपनी बात रखने का अधिकार था। सम्राट स्वयं न्यायिक मामलों की सुनवाई करते थे।

कठोर दंड के स्थान पर सुधार और नैतिक शिक्षा पर अधिक ध्यान दिया जाता था। अशोक का मानना था कि सच्चा शासन वही है, जिसमें प्रजा भय से नहीं, बल्कि प्रेम और विश्वास से जुड़ी हो।

प्रजा के प्रति समर्पण

सम्राट अशोक का दरबार प्रजा के लिए सदैव खुला रहता था। वे स्वयं को “देवानांप्रिय” और “प्रियदर्शी” कहलवाते थे, जिसका अर्थ है—देवताओं के प्रिय और सबके प्रिय। यह उपाधि उनके व्यवहार और नीतियों के अनुरूप थी।

दरबार में लिए गए निर्णयों का उद्देश्य केवल साम्राज्य का विस्तार नहीं, बल्कि जनता का कल्याण था। सड़कों के किनारे वृक्ष लगवाना, कुएँ खुदवाना, अस्पताल बनवाना—ये सभी योजनाएँ दरबार में ही तय होती थीं।

एक विशेष दरबार का काल्पनिक दृश्य

कल्पना कीजिए कि आज दरबार में एक महत्वपूर्ण सभा है। दूर-दूर से आए प्रांतीय शासक उपस्थित हैं। सेनापति सीमा की सुरक्षा की रिपोर्ट प्रस्तुत कर रहा है। धर्म महामात्र जनता में नैतिक शिक्षा के प्रसार की जानकारी दे रहा है।

तभी एक वृद्ध किसान अपनी समस्या लेकर दरबार में आता है। उसकी भूमि पर किसी अधिकारी ने अन्यायपूर्ण कर लगा दिया है। सम्राट अशोक ध्यानपूर्वक उसकी बात सुनते हैं और तुरंत जांच का आदेश देते हैं। दोषी अधिकारी को दंडित किया जाता है और किसान को न्याय मिलता है। पूरा दरबार सम्राट की निष्पक्षता की प्रशंसा करता है।

निष्कर्ष

सम्राट अशोक का दरबार केवल एक शाही सभा नहीं था, बल्कि वह न्याय, नीति, धर्म और संस्कृति का संगम था। वहाँ शक्ति और करुणा का अद्भुत संतुलन दिखाई देता था। अशोक ने अपने दरबार को प्रजा की सेवा का माध्यम बनाया।

उनका दरबार इस बात का प्रतीक था कि एक शासक की महानता केवल उसकी विजय में नहीं, बल्कि उसके न्याय, दया और लोककल्याण में निहित होती है। आज भी जब हम सम्राट अशोक के दरबार की कल्पना करते हैं, तो हमारे मन में एक ऐसे आदर्श शासन की छवि उभरती है, जहाँ प्रजा का सम्मान और सुख सर्वोपरि था।

सम्राट अशोक का दरबार भारतीय इतिहास की अमूल्य धरोहर है, जो हमें सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व वही है, जो शक्ति के साथ-साथ मानवता को भी महत्व दे।

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